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शुक्रवार, 7 जून 2013

तरकारीबाली

विहनि कथा-60
तरकारीबाली

- तरकारी लिअ ।हरियर, ताजा . . . ।
- गै पालक कोना छौ ?
- नै बेसी पचासे लगा देब ।
- पचास, बाप रे बाप. . .बड बेसी छौ . . . अच्छे ई खाइमे केहन लागै छै ?हम नै खेने छी ।
- नीके लागैत हेतै ।तीत तँ नहिये हेतै ।
- हेतै ?मने तूँहूँ नै खेने छहीं ।तोरा तँ अपन खेतेमे छौ तखन. . .
- एते ने मँहगाइ हइ जे एकरा खाइत ममता लागैत हइ ।बेच देबै तँ दू टाका कमा लेब, खेलासँ तँ किछु नै भेटतै ।
हम सोचमे पड़ि गेलौं ।जखन खेत बलाकेँ अपन उपजा खाइमे कोढ़ फटै छै तँ आम जनताक हाल केहन हेतै ?

अमित मिश्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. काल्पनिक जगत में हमही/आहाँ नहिं - बल्कि सावनी-मेढक जकां किछु-ने-किछु लिखनाहर भेटिए जाईत छथि, परंच अपनेक सोच अति-उत्तम अछि- एहि सत्य के स्वीकार करबा में कोनो मेष-वृष नहि

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  2. एतेक सुन्नर टिप्पणी पाबि उत्साह दूना बढ़ि गेल ।हार्दिक धन्यवाद आभा जी

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