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शनिवार, 16 जून 2018

बाल कविता- अन्हरिया भेल सबल

5.05 अन्हरिया भेल सबल

हुलकि बुलकि सभ दिन दै छल
से चान  मलिछाह पड़ल
आइ अन्हरिया भेल सबल

छुट्टीपर छै सभ तरेगण
भगजोगनी छै मामा गाम
बिजलौका नै आबि सकैए
देब अहाँ जँ कतबो दाम
हाथ हाथ नै सूझि रहल छै
ठेस लगा क' लोक खसल
आइ अन्हरिया भेल सबल

बहिते बहिते ठमकि गेल छै
हवा बिसरलै अपन बाट
गर्मी सेहो नाम केने छै
भेंटि रहल नै एकर काट
कारी कारी मेघ भयावह
छै अकासमे आइ भरल
आइ अन्हरिया भेल सबल

डोलि रहल नै पत्ता (बाल कविता)

5.02 डोलि रहल नै पत्ता

घरसँ बाहर लू चलै छै
डोलि रहल नै पत्ता
गाम-घर सभ ठाम भेल छै
आब गर्मी केर सत्ता

गर्मीसँ मुरझा रहल छै
गाछक कोमल पत्ता
पोखरि-झाँखरि से सुखल छै
सुखि गेल छै खत्ता

बुन्नी बनि क' घाम चुबै छै
भीजल कपड़ा लत्ता
लिखा-पढ़ी बन्द भेल छै
गलि गेल छै गत्ता

स्कूलक टास्के सन बढ़ै छै
आब गर्मी केर भत्ता
पाकल केश अकास लागै छै
करिया मेघ निपत्ता

मौसमसँ बलजोर नीक नै
कहलनि सरजी दत्ता
सभ किओ खूबे पानि पीबू आ
निकलू ल' क' छत्ता

©अमित मिश्र

कहि दे कन्हाइ(बाल कविता)

5.03 कहि दे कन्हाइ

बिना लजेने सब किछ कहि दे
कहि दे की सब भेलौ कन्हाइ
जलखैमे की खेलें आइ ?

आलूचॉप कचड़ी आ मुरही
आर समौसा कते पलेट
पानीपूरी चाट कचौड़ी
खट्टा पानिसँ भरलें पेट
सी सी क' बाजें कखन धरि
नोर बहेलें खा मिरचाइ
बेरहटमे की खेलें आइ ?

गरम जिलेबी लड्डू पेड़ा
कते किलो आ कते ग्राम
रबड़ी लस्सी आ ललमोहन
रसगुल्ला केर कह ने नाम
घेवर बर्फी कलाकंद कह
रसमलाइ सन कते मिठाइ
कलौ बेर की खेलें आइ ?

पिज्जा बर्गर पास्ता खेलें
आकि खेलें पकौड़ा ब्रेड
चिकेन चाउमिन अंडा खेलें
पावभाजी द' चटनी रेड
कस्समकस्स रौ पेट लागै छौ
भेल लागै छै खूब ठुसाइ
जलखैमे की खेलें आइ ?





रविवार, 3 जून 2018

अपरिमय संख्याँ

अपरिमय संख्याँ

जहिया हम वियाहि क' आएल छलहुँ
एकटा एहन घरक पुतौह भेलहुँ
जत' छलै संस्कारक संख्या रेखा
जकर एकहकटा बिन्दुपर
छलै एकहकटा शर्त
एकटा नियम
ओहि नियमसँ बन्हाइत गेलौं
मोने मोन औनाइत गेलौं

भगवान साक्षी छथि
ओहि रेखाक सभटा बिन्दु
हमर जीवन संग संरेख रहलै
कहियो कोनो नियम नै टुटलै

आइ फेर व्याहि क' आनलौं
अपन आशाक पुतौह
आशाक पेंसिलसँ फेर बनेलौं
एकटा झकझकाइत संख्याँ रेखा
जाहिपर बनेलौं फेर बिन्दु
शर्त आ ओहने नियम

मुदा ई की ?
एकरा एहि रेखापर आनब असंभव अछि
ई एकटा अपरिमेय संख्या अछि
जे नै अटि सकैए
कोनो बिन्दुपर ।

अमित मिश्र

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अथ गाम कथा

3.18 अथ गाम कथा

एकटा पंडितक गाम छल ।इलाका भरिमे एतुका पंडिताइयक डंका बाजै छल ।कोनो शुभ काज होइ, पंडित ओहि गामसँ जाइ छलथि ।विद्वानक गामक रूपमे चिन्हल जाइ बला गाम दिनो दिन उन्नतिक शिखरपर चढ़ल जा रहल छलै ।सरस्वतीक असीम कृपा एहन छलै जे एकहकटा नवका पीढ़ी  विद्वाने निकलै ।किओ ककरोसँ कम नै ।एक बेर सभक इच्छा भेलै जे गाममे एकटा यज्ञ हेबाक चाही ।गाममे सरस्वती संग लक्ष्मी विराजथि तकरा लेल ई अनुष्ठान परम आवश्यक छल ।सभ ग्रामीणकेँ ई विचार पसीन पड़लै आ शुरू भ' गेलै ओकर ओरियान ।घरे घरे चन्दा भेल ।किओ घी गछलकै त' किओ तिल ।किओ हवनक लकड़ी देलकै त' किओ बाँस, खर ।दूध, चाउर, शक्कर सभक इंतजाम भ' गेलै ।हवन कुण्ड तैयार भ' गेलै । पूजन मंडप बनि गेलै ।अंतमे बात एलै पंडितपर ।पूजा के करेतै ? गामक नामी विद्वान सभ पतनुकान ध' लेलनि ।एना व्यवहार करअ लागलनि जेना हुनका किछु आबिते नै छै ।सभक सरस्वती मंद भ' गेल छलै ।कारण मात्र एकटा चिन्ता छलै ।चिन्ता ई छलै जे अपन गाममे दक्षिणा कोना क' लेब ? आ बिना दक्षिणाकेँ पूजा किए कराएब ? अंतमे विचार भेलै जे बाहरसँ पंडित बजाओल जाए ।सएह भेलै, एगारह टा अनगौआ अक्षरकट्टु पंडितकेँ बजाओल गेलै ।गामक लोक आ गामक जजमान सभ आश्चर्यमे पड़ल छलै ।नै रहल गेलै त' डेराइत-डेराइत एकटा जजमान गामक सभसँ पैघ पंडितकेँ पूछि देलकै," यौ पंडित जी, अहाँ सभ सन पैघ विद्वान पंडितकेँ रहने बाहरसँ किए बजेलियनि हिनका सभकेँ ?"
पंडित जी चतुराइमे कहलनि - नै बुझलियै, ई सभ बड पैघ विद्वान छथिन ।हिनका सभ लग हमर की मजाल जे एको टा मंत्र पढ़ि लेबै ।हिनका सभ लग गामक एकोटा पंडितक बकार खुलिए नै सकै छै ।"
जजमान माँथ नोचैत ओत'सँ चलि गेल ।एहि घटनाक असर ई भेलै जे गामक बाहर अरजल सभटा सम्मान रसे रसे कम भ' गेलै ।विद्वता रहितो बहरैयाकेँ लागअ लागलै जे गाममे विद्वानक कमी छै ।

जो गे दाइ

जो गे दाइ तोरा इहे कपारमे
मन मजगूत कर, आब ने तूँ डर
पूरा कर सब बिध वेवहार
जो गे दाइ तोरा इहे कपार मे

नवका गीतक मुखड़ा