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सोमवार, 19 जनवरी 2015

दैनिक भास्कर मे छपी आलेख- कल की भी सोच कवि


बच्चे देश के भविष्य हैं और इसे सँवारना एक साहित्यकर का प्रथम कर्तव्य है  हर जगह वयस्क साहित्य देखने को मिलता है परन्तु बाल साहित्य...नहीं के बराबर ।जरा सोचें यही बच्चे तो कल के भविष्य हैं ।इन्हे साहित्य का चस्का लगाना जरूरी है, खास कर क्षेत्रिय साहित्य का ।क्षेत्रिय भाषाओं को दिर्घायु बनाने के लिए उस में भरपूर बाल साहित्य का होना बहुत जरूरी है ।यदि बच्चे इन भाषाओं को छोड़ कर अन्य भाषाओं को सीखने लगे तो कुछ सौ वर्षों के बाद उस क्षेत्रिय भाषा का पतन निश्चित है ।आखिर पीढ़ी दर पीढ़ी भाषाओं का वाहक यही बच्चे तो हैं ।
इसका प्रत्यक्ष उदाहरण साहित्य समृद्ध भाषा मैथिली है जिस में बाल साहित्य नगण्य है ।भले हीं सैकड़ों साहित्यिक किताबें प्रतिवर्ष छपती है परन्तु स्थिती यह है कि मैथिल बच्चे मैथिली शब्द से अपरिचित होते जा रहे हैं ।हालाँकि विगत कुछ वर्षों में बाल रचनाएँ रची गई है फिर भी यह बच्चों से दूर है ।बाल साहित्य को समृद्ध करने के लिए अब युवाओं को आगे आना होगा ।युवा अभी बचपन से अधिक दूर नहीं गये हैं अतः उनके लिए यह सहज होगा ।कुछ मित्र बाल साहित्य लिखना कठिन मानते हैं पर यह सिर्फ वहम है ।डेढ़ सौ से अधिक बाल कविता रचने के क्रम में मेरा अनुभव है कि आप बच्चों के जितने नजदीक होगें, बाल साहित्य उतने हीं रुचिकर रच पाएँगें ।इतना हीं नहीं आपके लिखने से बच्चों में भी साहीत्य लेखन की ललक पैदा होगी ।प्रयोग के तौर पर पिछले वर्ष से मैं अपने वर्ग-कक्ष में बाल-कविता परोसता हूँ ।अभी हाल यह है कि कुछ बच्चे भी तुकबंदियाँ करने लगे हैं ।आप कोशिश तो करें, सफलता अवश्य मिलेगी ।मेरी माने, बाल-साहित्यकार बनना फायदे का सौदा है - एक तो बच्चों का प्रेम मिलेगा ।दूसरा आप कभी बूढ़े नहीं होगें ।आपका बचपन हमेशा आपकी रचनाओं में उछल-कूद मचाता रहेगा ।
साहित्यकारों से अपील है कि कलम उठायें, अपने बचपन में झाँकें, बाल मनोविज्ञान को पहचाने, सोचें और एक उम्दा बाल साहित्य रच दें ।साथ हीं बचपन की मस्ती को याद कर कहें -
''रहमत हो तो मुझ पे ऐसा हो
जवानी भी बचपन जैसा हो"


2 टिप्‍पणियां:

  1. विद्यमान में समाचार पत्र अश्लील सामग्री हो चले हैं बच्चों को इस सामग्री से दूर रखना चाहिए
    ये इलेक्ट टॉनिक मीडिया जो कभी मैक्सी थी ही नहीं मिनी से माइक्रो हो गई है.…. भारतीय समाज की दशा बताती है आजकल..... दिशा भी दिखाती है अब कोई इसको देखे की दिशा को देखें

    राजू : -- चौबीस पच्चीस की होगी नई इससे पहले बुलेट की रफ़्तार वाली बुले-टिन थी ये.....

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  2. सहमत हैं पर सभी पत्र-पत्रिका को इस श्रेणी में रखना क्या जायज होगा ?

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