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शुक्रवार, 24 अक्तूबर 2014

देहक डिबियामे

गजल-2.44
देहक डिबियामे साँसक तेल अजब
अन्तिम गति बुझितो नेहक मेल अजब

सदिखन चिन्ता ई दीया नै मिझाइ
प्रतिपल छै बाती-झंझाकेँ खेल अजब

सब ठाँ झगड़ा उकटा-पैंची सदिखन
उसरल सब काजो भाँगठ भेल अजब

ओ जनमक छल केहन टा ब्याज बचल
ऐ जनमहुँमे नै छोड़ल गेल अजब

जा धरि चलती ता धरि सब संग अपन
जे पोसय से जड़बय ई खेल अजब

2222-2222-121

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