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शनिवार, 23 मार्च 2013

सात समुद्र पारसँ

विहनि कथा--सात समुद्र पारसँ

मनोहर बाबू इलाकाक नामी डाँक्टर छलाह । बजारमे तीन तल्ला घरमे अपने , कनियाँ दू टा बेटा संग माँ-बाबू सेहो रहै छलथिन । अथाह रूपैया तेंए कोनो चिजक कमी नहि ।अपनो नव जमाना कए आ कनियो कलजुगी,अपना मोनक मालिक छलनि । हुनक कनियाँ शरबत जकाँ घोरि कऽ ई बात पिया देलकनि जे माँ-बाबू बिमार रहै छथि,तेंए बच्चा कए इनफेक्सन भऽ सकै यै , दोसर देखभाल करबाक लेल फुरसतो नहि अछि तेंए दुनू गोटे कए वृद्धा-आश्रम दऽ आबियौ । मनोहर बाबू सब बात माँ-बाबू कए कहखिन । ताहिपर बाबू नोराएल नैन सँ कहलनि ,"अपन संस्कृति ई आदेश नहि दै छै , हम कते दिन जीबे करब? तोहर मूँह देखैत मरब तऽ शांती भेटत , हमरा संगे रहऽ दए , "

मनोहर बाबू जबाब देलनि ," जहिना अंग्रेजी ,पहिराबा , खान-पान , रहन-सहन संग बहुतो रास तकनीक दोसर संस्कृतीसँ आबि अपन भऽ गेल , तहिना वृद्धा आश्रम भेजबाक संस्कृती अपनाबऽ परत किएक तऽ ई सात समुद्र पारसँ एलै यै ,एकरा छोड़ल नहि जा सकै यै "
दुनू प्राणी बेटा कए मूँह ताकैत सोचऽ लागलाह जे केहन जमाना छै लोक कोना बदलि रहल छै अपन संस्कृति कए सात समुद्र पारसँ . . . । ।

अमित मिश्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर कथा, आजुक ज़माना के सच्चाई.

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  2. अमुल्य समय निकालि विहनि कथाकें पढ़ि टिप्पणी देबाक लेल आभारी छी

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