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सोमवार, 19 अगस्त 2013

अहाँक सिनेहकेँ

अहाँक सिनेहकेँ

बान्हि कऽ रखने छी अहाँक सिनेहकेँ
जग भरिसँ नुका छाँपने छी फाटल केथरीसँ
अहाँ चिन्ता जुनि कएल करू
अहाँक सिनेह केवल अहीँक रहत
ने बौआएत ने हेराएत ने पगलाएत
अहाँक सिनेहकेँ फुलाए नै देबै
बीच्चेमे झटाहि देबै ओकर ठाढ़ि-पातकेँ
वा दाबि लेबै अपन करेजक माँटि तऽर
हवा-पानिसँ दूर कऽ अँकुरैये नै देबै ओकरा
हँ, सूर्य सन दिव्य अहाँक सौन्दर्यक
मास-दू मासपर दर्शन करा देल करबै
अहाँ निफिकिर रहू, बिसरऽ नै देबै
बतियेबाक लेल छटपाटाइत अहाँक सिनेहकेँ
अहाँ दुर्गाक प्रतिमा बनि ठाढ़ रहू कोनो ठाम
राक्षसक संहार जकाँ तोड़ैत रहू आनक सिनेहकेँ
अहाँ अपन चालिसँ पवित्र करैत रहू धराकेँ
अहाँ ताकैत रहू प्रेमक वशीभूत भेल छागरकेँ
अहाँ अपनाकेँ अपराधी किन्नहु नै मानू
आखिर अहाँ सन दुर्गाक चरणमे
सिनेह भरल करेजक बलि पड़तै
आ खून चढ़बे करतै तँ कोनो जुलुम नै हेतै

अमित मिश्र

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