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मंगलवार, 6 अगस्त 2013

विधवाक श्रृंगार

132. विधवाक श्रृंगार

प्रेमीसँ पति बनल मोहनकेँ मुइलाक बाद राधाक जिनगी श्मशान सन भऽ गेलै ।नैनमे सदिखन सावन-भादो उमड़ल रहै ।उज्जर कपड़ा ओकरा लेल कफन सन बनि गेल छलै ।मात्र मोहनक प्रेम जे ओकर कोखिमे छलै से ओकरा मरऽ नै दैत छलै ।ओकर श्रृंगार बिनु मलीन भेल रूप देख ओकर सासुकेँ रहल नै गेलै ।अन्तत: सासु राधाकेँ दोबारा वियाह करबाक लेल कहलै ।राधाक जबाब छलै "नै माँ, हम दोसर वियाह कऽ मोहनक दिल तोड़ऽ नै चाहैत छी ।हम एखनो हुनकेसँ प्रेम करैत छी ।सब ठाम ओ हमरा देखाइ दैत छथि ।"
"यै कनियाँ, अहाँक सून रूप देख मोहन बेसी दुखित होइत हेतै ।अहाँक सपनामे सब दिन आबैत अछि, मने ओ सदिखन अहाँक संग अछि ।जखन अहाँक प्रेम ओकरा लेल जिबिते अछि तखन ओकरा अपनेबाक चाही ।विदेहे रूपमे सही ओ अहाँक पति अछि जे सदिखन अहाँकेँ चाहैत अछि, अहाँक संग अछि ।"एते कहि सासू राधाक माँथपर आएल भाव पढ़ऽ लागलीह ।फेर कहलनि "जखन अहाँक पति अहाँ संग अछिए तखन अहाँकेँ श्रृंगार करबाक चाही ।जखन सोहागसँ नेह करैत छी तँ सोहाग सजेबाक चाही ..."
सासुक बात सूनि राधा दोसरे दुनियाँमे पहुँचि गेलीह ।हाथमे बिन्दिक पत्ता लेने, बाँहि खोलने ओकरा मोहन देखाइ पड़लै ।बेसुध भेल राधाक हाथ नहूँ-नहूँ बिन्दी दिश बढ़ऽ लागलै आ विधवाक रूप चमकऽ लागलै ।

अमित मिश्र

3 टिप्‍पणियां:

  1. भाव नीक अछि लेकिन कथा प्रगतिशील नहीं कहाओत.

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  2. धन्यवाद झा जी आ ठाकुर जी ।
    एकरा प्रगतिशील कोना बनाओल जाएत ?बतेबाक कृपा करी ।

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