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मंगलवार, 1 अक्तूबर 2013

गंगाजल

152. गंगाजल

शोभन राम ट्युशन पढ़ेबाक काज करैत छलथि ।पंडित सीताराम झा शोभनक योग्यता देख अपन बेटा-बेटीकेँ पढ़बैक लेल शोभनकेँ बजेलनि ।हवेलीक बाहर बनल एकचारीमे पठन-पाठन शुरू भऽ गेल ।एक दिन कोनो बातसँ तमसा कऽ गुरू जी पंडित जीक बेटाकेँ एक थापर लगा देलनि ।थापर लागिते पंडित जीक बेटा शोभनपर चिकरैत बाजल "हौ तूँ हमरा छुअल नै करऽ , हमरा गंगा जलसँ नहाय पड़त ।एकटा बात और हमरापर हाथ नै उठाएल करऽ । एक मिनटमे जेल पठबा देबऽ ।तोरासँ बेसी मातबर छी हम ।बुझलहक ने ?"
छोट नेनाक बात सूनि शोभन सोचमे पड़ि गेल छल 'आखिर पाँच बरखक अवोध नेनाकेँ अमीरी-गरीबी, जाति-पातिक पाठ के पढ़लकै ?गंगामे तँ हमहूँ नहाइत छी तखन हम अछूत कोना ?' शोभन सोचिते छल तखने पंडिजीक बेटा गंगाजलक डिब्बा हाथमे लेने घरसँ बाहराएल ।

अमित मिश्र

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