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रविवार, 10 अगस्त 2014

सावन बरसें

बाल कविता-132

सावन बरसें

भोरेसँ अकास ताकै छी
तोरा खूब उड़ैत देखै छी
फुसिये नै बिजलौका चमकें
सावन बरसें, सावन बरसें

खन उज्जर खन श्याम बनल
खन कोयला खन तूर भरल
कनिये पानिक बोझहा अरजें
सावन बरसें सावन बरसें

पानि बिना हम कना जीबै
कोन डबरामे नाह चलेबै
छूच्छे नै ढनढन कऽ गरजें
सावन बरसें सावन बरसें

इनार पोखरि धरि सुक्खल छै
तोरा लेल धरती भुक्खल छै
मुट्ठी अपन खोलि कऽ बरसें
सावन बरसें सावन बरसें

अमित मिश्र

1 टिप्पणी:

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