प्रिय पाहुन, नव अंशु मे अपनेक हार्दिक स्वागत अछि ।

मंगलवार, 22 अक्तूबर 2013

जिम्मेदारी

161. जिम्मेदारी

"हे कने बाँहिमे तँ आउ ।"
"दुर जाउ ।अहाँकेँ केहनो लागैत नै अछि जे जखने-तखने शुरू भऽ जाइ छी..."
"... आ अहाँ सदिखन पड़ाइत रहै छी ।हे यै अहाँ हमर कनियाँ छी, मुदा देखियौ तँ हमरे कुकुर, हमरेपर झाँउ-झाँउ !"
"और नै तँ की !अहाँकेँ किछु लागैत अछि ?आब बौआक जिम्मेदारी माँथपर छै ।अहाँपर धियान देलासँ मात्र वर्तमान सुधरत मुदा बौआपर धियान देलासँ अपना दुनू प्राणीक भविष्य सुधरत ।"
"हँ, से तँ अछि ।ठीक छै जाउ, बौआकेँ देखियौ गऽ ।"

अमित मिश्र

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-10-2013)   "जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग" (चर्चा मंचःअंक-1407)   पर भी होगी!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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