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सोमवार, 6 मई 2013

चिराँइ बाजल

बाल कविता-43
:) चिराँइ बाजल :)

चीं चीं चीं चीं चिराँइ बाजल
खेलैत-खेलैत अंग-अंग थाकल
साँझ भेलै आब सूरज सूतल
लागल भूख पियासो जागल

सून भऽ गेल छै गाछी-चऽर
जाल फेकत शिकारी देख एसगर
चल चल चल झटकैत चल घर
हमरा बिनु लागैत हेतै माएकें डर


अमित मिश्र

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस कविता को पढ़ कर उत्साहवर्धक टिप्पणी देने केलिए हार्दिक धन्यवाद

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