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बुधवार, 26 जून 2013

गुण-अवगुण

बाल कविता-78
गुण-अवगुण

कबकब लागै सन्ना ओल
मिरचाइ खाइसँ करुगर बोल
करैला तीत रमतोरइ लसफस
घिउरा लागै हमरा निरस
परोर सदिखन कचकच करै
आलू माँटिये तऽरमे फरै
सजमनि सौंसे खेतमे पसरै
कदिमा तँ छप्परपर चतरै
मुइनगामे नै गुद्दा रहै
बैगनमे तँ बीये भरै
हरियर तैयो खेबाक चाही
स्वस्थ शरीर सहै छै दाही
सबमे रहै छै गुण-अवगुन
सब ठाँ नीक-बेजाए धुन
हम सब लऽ ली सबटा गुण
छोड़ि दी ओहिना सब अवगुण
तखने बनबै हम नीक मनुख
बनबै देशक महापुरुख

अमित मिश्र

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति . आभार संजय जी -कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए. आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  2. प्रवीण झा28 जून 2013 को 12:08 pm

    व्यवहारिक आ नीक ।

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