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शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

आम

बाल कविता- 259
आम

किछु खट्टा किछु मिट्ठा आम
लेर    चुबै   छै   लैते    नाम
हरियर  पीयर   नम्हर   छोट
छोटकी   आँठी   गुद्दा  मोट
काँच  छलै  त' चटनी   भेल
ओगरैमे  बड   खटनी  भेल
पाकि गेलै  त'  अमरित सन
दूरहिंसँ    ललचाबय     मन
फ'लक  राजा   बनलै  आम
किछु बिज्जू किछु कलमी आम

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (23-04-2017) को
    "सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. ठेठ देहाती अंदाज़ में बेहतरीन कविता

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