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रविवार, 14 दिसंबर 2014

कथा- सपना व्यस्त छथि



कथा -सपना व्यस्त छथि

सपना पिछला चारि दिनसँ बड बेसी व्यस्त छथि ।एक तँ पछिया तेज गतिसँ दौड़ल जा रहल छै आ दोसर काजक दबाब बढ़ि गेल छै ।दुनूसँ लड़ैत-लड़ैत सपनाक मुँह सुखाएल जा रहल छै ।ठोर सेहो सूखि गेल छै आ सुख्खल ठोरपर पपड़ी सन जमि गेल छै ।एक-आध ठाम ठोर फाटि गेलैए आ खून सेहो बहि रहल छलै ।बजलापर ठोरमे दर्द जरूर होइत हेतै, मुदा एकर चिन्ता ककरा छै !आजुक दिने एहन छै जे सपनाकेँ व्यस्त भेने बिना काज नै चलतै । काज कोनो कम छै !घरकेँ धोइक छै, आँगन-दलान निपैक छै, भानस-भात करैक छै, टोल-पड़ोसमे हकारो दैक छै ।एतबे नै, हलुआइ आबि गेल छै, ओकरो लऽग सब समान पहुँचेबाक छै ।सुरुज भगवान माँथपर चढ़ि रहल छथि, मुदा टेन्ट बला नै एलै।ओकरो समाद देबऽ पड़तै ।छतपर नेना-भुटका सब चढ़ि कऽ हुड़दंग मचेने छै ओकरो जा कऽ दबारऽ पड़तै ।कहीं खसि-तसि पड़तै तँ सब रंगमे भंग भऽ जेतै ।उपरसँ माँथपर कलंक चढ़ि जेतै, से अलगे ।घरमे मारिते रास काज पड़ल छै एहने-एहने पैघ-छोट काजमे भोरसँ साँझ धरि सपना व्यस्त छथि ।

घरक सबटा काज सपनेक माँथपर छै ।करैयो बला तँ दोसर किओ नै छै ।सब घरमे एसगरूआक इएह हाल होइ छै ।घरमे दू-चारि टहल-टिकोरा करै बला समांगकेँ रहने सबटा काज सभक हिस्सामे बँटि जाइ छै ।ककरो माँथपर काजक पैघ बोझ नै बुझना जाइत छै ।जहिना एक टाँगपर बेसी देर धरि किओ ठाढ़ नै रहि सकै छथि किछु कालक बाद या तँ दोसरो पएर रोपि दै छथि वा खसि पड़ै छथि ।ठीक तहिना एसगरूआ
आदमीकेँ घरक सबटा काजकेँ नियमपूर्वक करैक क्रममे या तँ नियम टूटि जाइ छै वा काज छूटि जाइ छै ।नै तँ ककरो दोसरक सहारा लेबैये टा पड़ै छै ।एसगर दुनियाँ भरिक काज केनाइयो सम्भव नै छै, मुदा सपनाकेँ करैये पड़तै ।एतऽ दूध-माँछ दुनू बाँतर भऽ गेल छै ।एक्को टा काज छोड़ै बला नै छै आ घरमे किओ और छैहो नै जकरा काज अढ़ाएल जाए ।क्रमिक रूपसँ सबटा काज कएल जा रहल छै
।आँगन-दलान चकाचक भऽ गेलै, पिठार पिसा गेलै, कोहबर पड़ा गेलै, उखरि-समाँठ
धुआ गेलै, जतरा लेल माँछो आबि गेलै ।एखन गुनामुना पकबैमे सपना व्यस्त छथि
।

चौबिस साल धरि सपनाक जीवन एसगरे बीतल अछि ।एहि बीचमे कतेको बेर बसंत एलै ।कतेको बेर गाम-घरमे फगुआ एलै ।हुड़दंग मचेलकै, नाँचलै आ सबकेँ नचेलकै, मुदा सपना लेल धन्नसन ।ओना तँ ई सब मोसम सभक लेल आनंदक डबल पैकेज लऽ कऽ आबै छै ।कहल जाइ छै जे एहि मोसममे बुढ़बोमे जुआनी हिलकोर मारऽ लागैत अछि, मुदा सपना सदिखन एहन मोसमसँ दूरी बनेने रहल छथि ।फागुन हो वा बसंत, एसगर दुनू निरस लागैछै, मुदा एहि फगुआमे एसगर कटैत जिनगीक चक्का जाम भऽ जेतै ।आइ धरि जे भेलै से भेलै, काल्हिसँ सपनाक घर भरि जेतै ।काल्हिसँ होइ बला
बदलावक अनुभव कऽ अगिला योजना बनबैमे सपना व्यस्त छथि ।

बड शुभ दिन छै आइ ।आठ मास पहिने सपना अपन गुरूसँ दिन तकेने छलीह ।आठ मास बाद दिन बनल छलै ।ओना तँ बीच्चोमे दिन छलै, मुदा ग्रह-नक्षत्रक योग ओतेक नीक नै छलै ।सपना कोनो बेसी धड़फड़ाएल नै छलीह ।ओनाहितो सपना ग्रह-गोचरमे बेसी विश्वास रखैत छलीह ।समाजक बदलल स्थिति देख बड बेसी साकांक्ष रहैत छलीह ।इएह सब कारणसँ अझुके दिन बनाएल गेलै ।लगनक उत्तम योग छै आइ ।आइ घरमे लक्ष्मीक प्रवेश भऽ रहल छलै ।घरकेँ भविष्यक लेल मलकाइन भेंट रहल छलै ।आइ घरमे नव कनियाँ आबि रहल छथि ।हुनके स्वागतक तैयारीमे सपना व्यस्त छथि
।

सुख्खल मुँहपर अभरि रहल आनंदक अंशुकेँ स्पष्ट रूपसँ देखल जा सकैत अछि ।मोनक अथाह सागरमे खुशीक लहरि तीस वर्ष पहिने उठल छलै जखन सपना एहि घरमे आएल छलीह ।अपन नैहरक सुख-दुकेँ छोड़ि सासुरमे आएबाक खुशिये एहने होइत छै ।नव जगहपर आबि अपन देख-रेखमे काज करेनाइ आ अपन अराध्य पति परमेश्वरक संग
जीवन कटनाइ ककरा नै नीक लगैत छै !सपनाक सासु नै रहथि ।पति भैयारीमे एसगरे रहथि, मने दियाद-वादक कोनो झंझटे नै रहै ।सासुर आबिते घरक सबटा काज अपना माँथपर उठा लेने छलीह ।ककरो रोक-टोक नै छलै ।अपन मरजीसँ घरक संचालन करैत छलीह ।पतिक समर्थन पाबि दुनू प्राणीक जिनगी विहुँसैत रहल  दुरागमनक छअ साल बाद संजयक जन्म भेल छलै ।घरमे तँ होली आ दिवाली दुनू एक संग मनाएल गेलै ।सब खुश छल, मुदा एहि खुशीक बोरिया-बिस्तर दुखान्तक संग बन्हेलै ।संजयक जन्मक एकै मास बाद पतिक मृत्यु भऽ गेलै ।सपनापर विपतिक पहाड़ टूटि पड़लै ।एक मासक चिलकौरकेँ छातीसँ साटने श्रद्ध-कर्म करेलनि ।खेत-पथार,
घर-बाहर, सर-कुटुम सब टा काज सपनेक हिस्सामे आबि गेल छलै ।नम्हर घर-दुआरिमे एसगर भूत जकाँ बैसल-बैसल नीको नै लगैत छलै ।मोन बहटारैक लेल कोनो ने कोनो काजमे अपनाकेँ व्यस्त रखने रहै छलथि ।

संजय छअ सालक भऽ गेल छलै ।इस्कूलमे नाम लिखा गेल छलै ।भोरे संजयकेँ तैयारकऽ इस्कूल पठाबथि ।एते दिन धरि बौआक संग हँसैत-बतियाइत दिन काटि लै छलथि,
मुदि आब भरि दिन मुँह सीने रहऽ पड़ै छलनि ।बतियेबो करितथि तँ ककरासँ ?देबालोकेँ कान तँ होइ छै, मुदा मुँह तँ नै होइ छै ।चारू कात तँ देबाले-देबाल छलै, मोनक बात बताएल जाए तँ ककरा ? आब संजयकेँ इस्कूल


पठेलाक बाद रमायण, गीत वा महाभारतक पाठ करऽ लागलनि ।एहि बीचमे अयोध्याक
महात्मासँ दीक्षा लऽ लेने रहथि ।भगवानक धियानमे मोन रमेने रहथि आ सदिखन
संजय लेल नीक लूरि-बूधिक कामना करैत रहथि ।

संजय रहबो करय बड मेधावी ।नेनहिँसँ जे किछु पढ़ि लै से इयादिये भऽ जाइ
।राज्य स्तर धरि कतेको बेर पुरस्कृत भऽ चुकल रहय ।सपनाक पूजा-पाठ काज कऽ
गेलै ।संजय डाक्टर बनि गेल छल ।बजारमे क्लिनिक छलै आ प्रैक्टिसो खूब चलै
छलै ।समाजमे सपनाक इज्जत बढ़ि गेल छलै, मुदा सपनाक एकान्त वास कम नै भेल
छलै ।सपना एखनो एसगरे रहैत छलीह ।शहर चलबाक लेल कतेको बेर आग्रह केने रहै
संजय, मुदा सपनाकेँ घर-घरारीक मोह धेने रहै ।गाम छोड़ि देलाक बाद एतुका
काज के करतै ?बाप-बाबाक बनाएल ढेरी उनटि जेतै ।जाहि गाममे जीवनक तीन भाग
बीत गेलै तकरा कोना छोड़ि देब ? नाना प्रकारक बात मोनमे आबि गेल छलै आ
सपना गामेमे रहि गेलीह ।

एक साल पहिने पढ़ल-लिखल लड़कीसँ संजयक वियाह भेल छलै ।सोझे वरखे आइ दुरागमन
भऽ रहल छै ।चारि दिनसँ व्यस्त दिनचर्यासँ थाकल देहपर आनंदक आवरण चढ़ेने
छलीह सपना, मुदा मोने-मोन टीस उठि रहल छलै ।अपने कहियो सासुकेँ नै देखलनि
।पुतौह संग सासुक वेवहार केहन होइ छै से नै जानलनि ।आजुक नव कनियाँक
कारनामा सुनि कऽ सदिखन डर लागल रहै छनि ।कहीं आबिते झगड़ा हुअ लागलै तँ
?कोनो कोनो पुतौह तँ सासुपर हाथो उठा दै छथि ।कहीं हमरो संग एहने भेलै तँ
? पुतौहकेँ एबाक खुशीक संग संग कलयुगी जमाना देख भीतरे-भीतरे डेराएलो
छलीह सपना ।




दुरागमन भऽ गेल छै ।टोल भरिक आँगनमे कनियाँक रूपक चर्चा भऽ रहल छै
।टोल-पड़ोसक लोक कनियाँसँ भेंट करबाक लेल आबि रहल छथि, मुदा सपना पुतौहसँ
कटल-कटल रहै छथि ।सपनाक ई वेवहार संजय नै बूझि सकल, मुदा कनियाँ बूझि
गेलीह ।एक दिन झलफल बेर कऽ सपना बैसल नचारी गाबि रहल छलीह ।तखने पुतौह
लऽगमे आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेलनि ।सपनाक दुनू पएर छानि पुतौह कानैत कहऽ लागलनि,
"माँ जी, हमर कोन कसूर अछि जे अहाँ हमरा नै अपनेलहुँ ?"
"अहाँ अपनाकेँ हमरासँ अलग किए बूझैत छी ।अहाँ एहि घरक सदस्य छी ।" सपना
बात नुकेलनि ।
"तखन हमरा किए ने माए बला सिनेह दै छीयै ?की बात छै माँ जी ?हमरासँ दूरी
किए बनेने रहै छी ?"
सपना सोचऽ लगलीह जे आब की कएल जाए ? किछु देर चुप रहलीह आ फेर मोनक बात
पुतौह लऽग राखि देलीह, " कनियाँ, हम आजुक जमानाक रंग देख दंग छी
।आइ-काल्हि सासु-पुतौहमे बड झगड़ा होइ छै ।हम अहाँसँ दूरी बनेने रहलौं
ताकि अहाँक सम्पर्कमे नै आबी ।अहाँसँ दूर रहब तँ अहाँ संग झगड़ो तँ नै ने
भऽ सकत ? तेँ हम अहाँसँ दूर रहै छी ।"
सासुक मुँहसँ सच्चाइ सुनि पुतौह अवाक् रहि गेल छलीह ।सपनाक पएर और जोरसँ
पकड़ैत बाजलीह, "माँ जी, ई सब बात मोनसँ निकालि दियौ ।अहाँ हमर पतिक माए
छी ।जँ पति परमेश्वर छथि तँ अहाँ हुनक जननी छी ।तखन तँ माएक स्थान
परमेश्वरोसँ बढ़ि कऽ भेलै ने ?जँ अहाँ नै रहितौं तँ हमर पतियो नै रहितय आ
जँ हमर पति नै रहितय तँ हमहूँ नहियें टा रहितौं ।. . .माँ जी, अहींमे तँ
हमरो अस्तित्व नुकाएल अछि ।. . .हमर मुँह देखाइ एखन धरि बाँकिए अछि ।मुँह
देखाइमे हमरा अपन चरण दऽ दिअ ।हमरा अपन बेटी बना लिअ . . ."
सपना अपन पएरपर पुतौहक आँखिसँ खसल नोरक गरमी अनुभव केने छलीह ।पुतौहक नरम
मोन आ विनम्रता देख सपनोक मोन पिघलि गेलै ।मोनमे पैसल सबटा डर दूर भऽ गेल
छलै ।सबटा शंकाक समाधान भऽ गेल छलै ।झलफल बेर टरि गेल छलै आ चारू कात
अन्हिया पसरऽ लागल छलै, मुदा सपनाक मोनमे इजोरिया पसरि गेल छलै ।

आब पुतौह सासुक पएर जाँति रहल छथि आ पुतौहकेँ गृहस्थीक उतार-चढ़ाब,
लूरि-बूधि सिखेबामे सपना व्यस्त छथि ।

अमित मिश्र
करियन, समस्तीपुर
मो॰- 09122105183
***

हमर पूरा पता अछि-

अमित कुमार मिश्र
ग्राम+पो॰- करियन
भाया- इलमासनगर
जिला- समस्तीपुर
राज्य- बिहार
पिन- 848117










सोमवार, 18 मार्च 2013

मोछ

कथा -- * मोछ *



मिथिलाक लोक जहिना दही-चुड़ा  माछ .मखान आ पान कए प्रेमि होइ छथि ओहिना गप्प-सड़क्का कए सेहो बड़का प्रेमि होइ छथि । जँ दु-चारि टा संगी एकठाम जुटला आ गप्प नै भेल ,एहन भS नै सकै यै । देश-विदेश , घर-दुआरि , क'र-कुटमैती , वियाह-द्विरागमन , फिल्म-राजनीति बहुतो रास शिर्षक छै ,गप्प करबाक लेल ।गाम-घर मे ताशक चारि-चारि टा चौकरी एक्के ठाम भेटत आ उहो ठाम गप्पक सुगंध भेटै छै । खुदरा मे गप्प तS हाट-बजार , ट्रेन-बस , गाछी-बिरछी ,बाध-बन आदि जगह भेटबे करै छै मुदा थौक मे गप्पक सरोबर बहै छै ,चाहक दोकान पर ।

                                                                              हम्मर गामक चौक पर एक्केटा चाहक दोकान छै , सुरेन्द्र  कए चाहक दोकान । साँझ कS गामक सब बड़-बुजुर्ग ओही दोकान पर जुटै छथि आ चाहक चुस्की संग फुटै छै गप्पक फटक्का । हम्मर एकटा फरीक मे कक्का छथि ,मधु कक्का , जेहन नाम तेहने काम , मुहँ सँ सदिखन मधु चुबैए छेन । मधु कक्का कए गप्प बड़ नीक होइ छै ,हिनकर गप्प सुनबाक लेल साँझ कS चाहक दोकान पर भीड़ जुटल रहै छै । चाह संग बिस्कुट ,समौसा , लिट्टी , जीलेबी . सेहो बड़ बिकाइ छै , इएह कारण छै जे सुरेन्द्र मधु कक्का कए फ्रि मे चाह , बिस्कुट आ कहियो-कहियो जीलेबी .समौसा दS छै । आ एकर बदला मे कक्का नव-नव गप्प सुनबै छथिन। गप्प आ मधु कक्का कए महिमा अपरंपार छै जतेक बखान करब ततेक कम मुदा एहि ठाम कोनो गप्प नहि एकटा घटना बता रहल छी ।

                                                                                          एक बेर हम अपन किछु दोस्त संगे ओहि देकान पर नाश्ता करबाक लेल गेलौँ  । दोकान पर पएरो राखै कए जगह नै छलै  , किछ गेटा तीनू बेँच पर बैसल छलखिन आ जिनका जगह  नहि भेटलनि से ठार छलखिन , सबहक बीच मे ऊँचगर कुर्सी पर मधु कक्का बैसल छलखिन । हम कक्का कए देखलौँ तS जा कS गोर लागलियनि  । हमरा देख कक्का बाजलाह ," बौआ , दरभंगा सँ गाम कहिया एलहो ।"
   "कक्का काल्हि साँझ मे एलौँ " हम सामने मे ठार होइत कहलयनि ।
हमरा दिश कनेक काल देखला कए बाद कहलखिन ," बौआ , वियाह भS गेलS की ?,"
हम अकचका गेलौँ जे कक्का एहन प्रश्न किएक पुछि रहल छथि । हम मुड़ी निच्चा केने बाजलौँ ,"कक्का ,एखन तS पढ़ि रहल छी , कत्तौ नोकरी भेटत तहन ने नीक दहेज ,नीक कनियाँ आ नीक ठाम वियाह हएत , ओना अहाँ एहन प्रश्न किय पुछलियै ।"
 
" तोरा  नहि मोछ छS नहि दाढ़ी छS आ नहि टिक छS  , तS हम की बुझियै , हौ , जेकरा वियाह भेल रहै छै तकरे ने इ सब नहि रहै छै । " कक्का बड़ा शान्ती सँ बाजलाह ।

हम्मर समझ मे इ तर्क आबि नहि रहल छल । आखिर मोछ सँ वियाहक कोन संबंध , कोन प्रयोजन । लाजे हम्मर मुड़ी माटि मे धैस रहल छलै मुदा हमहूँ शहरी छौड़ा छलौँ चुप कोना रहब , तेँ हिम्मत कS  कहलौँ ," कक्का ,अहूँ गजबे बात करै छी आब वियाह सँ मोछक कोन संबंध आ टिक नै राखब तS नवका फैसन छै । "

" देखहक , देखहक भाई सब छौड़ा कोना बाजै छै ।" कक्का भीड़ दिश देखैत जोर सँ बाजलाह , " रौ , वियाह भेला कए बाद मर्द ,मर्द नै रहै छै ओ मौगी भS जाइ छै आ जमाना जानै छै जे मौगी कए मोछ , दाढ़ी आ टिक नहि होइ छै , तोरा तS सदियह ऐ मे से किछ नहि छौ  , जँ एखनो तोँ अपना कए मर्द कहै छेँ तS जरूर तोहर वियाह भS गेल छौ ।"

लोक सब हम्मर आ कक्का कए बार्तालाप सुनै छलैए आ मुस्की मारै छलैए । आइ कक्का कए नजैर पर हम चैढ़ गेल छलौँ । मोने मोने हम ओही   क्षण कए के गरियाबै छलौँ जखन ऐ देकान पर आयबाक लेल सोचने छलौँ । सब चाहक चुस्की आ हम्मर बेज्जती सँ मुड-फ्रेस कS  रहल छलैए ।
हम खिसिया कS कहलियै ,"कक्का .राम भगवान कए देखू , कृष्ण भगवान कए देखू , किनको मोछ नहि छै तS की ओ मर्द नहि छलाह ।"
" बौआ , ओ भगवान छलखिन तूँ तS मनुक्ख छेँ , जेना राम जी 14  वर्ष बन मे रहलखिन आ कृष्ण जी गीता  कए उपदेश देलखिन , एहन एक्को टा काज तूँ कS सकै छें? जँ भगवानक देखसी करै छेँ तS भगवान जेकाँ कर्म कS कए देखा , तहन फ्रि भS जेबेँ मोछ राखै सँ ।"

                                                                                     कक्का कए तर्कक  सामने हम कमजोर भS गेल छलौँ ,हमरा किछ फुरेबे नहि करै छलैए ,मुदा हमहूँ नव जमाना कए ,नव विचारधारा ,आ नव समाज मे जियै बाला प्राणी छी तS फेर एतेक जल्दी हारि कोना मानि लेब ।हम फेर कने सोचि कS कहलौँ ," आइ कए जमाना मे मुर्ख वा विद्वान सब पाइ चाहै छै , मोछ नहि , आ जँ मोछ राखब तS कोनो नामी कंपनी नोकरी नहि देतै आ जँ नोकरी नहि भेटत तS टाका नहि भेटत आ जँ टाका  नहि रहत तS भुखल  मरब , एहि कारणे कक्का मोछ राखनाइ जरूरी नहि छै ।" फेर कनेक काल ठमकी कक्का कए मूँह पर आबैत भावपढ़बाक कोशिश केलौँ आ फेर सँ हम अप्पन तर्क देलौँ ," आइ फिलम मे बड़का-बड़का हिरो सब बिन मोछ कए अभिनय करै छै और एक्के दिन मे लाखक-लाख टाका कमा लै छै , जाँ मेछ राखितै तS हमरा हिसाबे ओ सड़क पर रहितै । एकटा बात और मोछ बाला छोड़ा कए कोनो आधुनिक लड़की पसंद नहि करै छै ,आब केउ मुर्खे हेतै जे मोछ राखि कS  अपन पएर पर कुल्हरि मारतै ।"
  
  हम मोने-मोने सोचै छलौँ जे ऐ बातक कोनो काट कक्का लग नहि हेएत किएक तS महगाई कए जमाना मे टाका सब  कए  चाही ।मुदा कक्क तS कक्के छलाह ओ कोना हारि जेताह ।ओ चट दS  अपन बात कहलनि ," हम मानलियौँ जट टाका सबहक प्रथम जरूरत छै मुदा फिलम मे काज करै बाला मर्द नहि होइ छै ,अरे ऊ तS  अपना संगे बाँडीगार्ड कए फौज लS कS घुमै छै ,भीड़ मे नहि आबS चाहै छै , लाड़का लड़की कए रूप धS मूँह झाँपि कS बहराइ छै , ओकरा करेजे नहि छै खुलेआम धुमै कए , जे सदिखन डर मे जियै छै , आब तूँ ही कह जे ओ मर्द छै की मौगी ।सब नवयुवक ओकर अनुकरण करै छेँ आ मोछ कटाबै छेँ ।लाज कर रौ बौआ ,लाज कर ।"
         
                                                कक्का कए बात सुनि हम फेर सँ निरूतर भS गेलौँ । हमरा लSग आब कोनो एहन ठोस तर्क नहि छल जै सँ हम निमोछिया कए जीता सकितौँ ।हमरा चुप देख कक्का बाजलाह," बौआ ,शास्त्र-पुराण मे अनेको ऋषि-मुनी लिखने छथिन जे माय-बाप कए मरला कए बादे मोछ कटाएबाक चाही ।मोछ तS मर्दक पहचान छै । पहिलुक जमाना मे मोछे सँ बुझहा जाइ छलै जे के बलगर आ के कमजोर छै ।मोछक भेराइटी होइ छलै , छोटका मोछ ,हिटलर कट मोछ , पतरका मोछ आ सब सँ नीक मोछ होइ छलै कान धरि बाला मोछ । पाकल ,कारी ,लाल , कंघी मारल, गोल-गोल औँठिया मोछ ,रौद मे चमैक कs मुँहक तेज बढ़ाबै छलै ।आब तs इ सब सपना भs गेलै । आब तS सब किछ छोट भS रहल छै ,छोट मनुष्य ,छोट गाड़ी  , छोट बर्तन ,छोट नाम जेना माँम डैड ब्रो , छोट कपड़ा , छोट टिक , आ सफाचट मोछ । जेना फैसनक कारण सब किछ छोट भS रहल छै हमरा बुझना जाइ यै मुनुक्खक ऊँचाइ बकरी जेकाँ भS जाएत । बौआ हम सब मिथिलाक छी ,मिथिलाक नाउ ,संस्कार ,संस्कृती ,इज्जत कए माटि मे नहि मिला ।विद्यापति ,उदयनाचार्य ,मंडन सन विद्वानक धरती सँ मोछ रूपि धरोहर फैसनक सागर मे नहि भसा । मोछ राख ,टिक राख , जनेऊ पहिर आ शान सँ कह हम मिथिलाक छी , हम मैथिल छी ।"

                                                                                                    हम लाजे मुड़ी निच्चा केने कहलियै," कक्का कान पकड़ै छी , आइ सँ हम मोछ नहि काटब आ अपन संगीयो सब सँ कहब मोछ नहि काटबाक लेल ,अपन संस्कृती बचाएबाक लेल ।"
    सब ताली सँ हम्मर बातक समर्थन केलक । चाहक दोकान पर सँ भीड़ छटS लागल । ।

                                                                                                  { समाप्त }



सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

प्रेमक अंत

प्रेमक अंत ( हमर तेसर कथा )

आइ भोरे सँ आनंदक मोन कतौ अनत' अटकि गेल छलै । की करबाक चाही , की नै करबाक चाही ? गाम -घर मे की भ रहल छै ? एहि तरहक कोनो प्रश्नक जबाब पता नहि छलै । अपन सूधि-बूधि बिसरि गामक अबारा पशु जकाँ इम्हर-उम्हर भटकि रहल छल । पैघ केश-दाढ़ी , मैल-चिकाठि गंजी-पेँट मे अपना -आप सँ बतियाइत देख जँ केउ अनचिन्हार पागल बूझि ढेपा मारत त' कोनो आश्चर्यक बात नहि । आनंदक इ डेराउन रूप देख क' गामक लोक सब अपना मे बतियाइ छल जे परसू जखन दिल्ली सँ गाम आएल छल त' बड-बढ़ियाँ सब कए गोर लागि , काकी-कक्का , कहि क' नीक-नीक गप करै छलैए मुदा इ एके राति मे की भ' गेलै जानि नहि? लागै छै जे मगज कए कोनो नस दबा गेलै आ रक्तसंचार बंद भ' जाएबाक कारण मोन भटकि रहल छै । इहो भ' सकै यै जे बेसी पाइ कमा लेलकै तेए दिमाग खराप भ' गेलै वा भ' सकै छै जे पागल कए दौड़ा पड़ल होइ । आब एसगर कनियाँ काकी की सब करथिन , आब टोलबैये कए मिल क' राँची कए पागल वला अस्पताल मे भर्ती कराब' पड़तै , नै त' काल्हि जँ टोलक कोनो नेना कए पटकि देतै त' ओकर जबाबदेही के लेतै ? अनेक तरहक प्रश्न-उतर , सोच-बिचार के बाद टोलबैया सब निर्णय लेलक जे आइ साँझ धरि देखै छीये ,जँ ठीक नै हेतै त' साँझ मे सब गोटा मिल जउर सँ हाथ पएर बान्हि देबै आ काल्हि भोरका ट्रेन सँ राँची चलि जेबै । जे खर्च-बर्च लागतै से कनियाँ काकी देथिन ,जँ एन.एच लग बला एको कट्ठा घसि देथिन त' ओतबे मे आनंदक बेरा पार भ' जेतै ,आखीर जमीन बेचथिन किएक नहि ,बेटो त' एके टा छेन । कनियाँ काकी मतलब आनंदक माए सँ बीन पुछने टोलबैया ,सब हिसाब-किताब क' लेलक ।

उम्हर टोलबैया सब जमीन बेचेबाक ,आनंद कए पागल बना राँची पहुँचेबाक जोगार मे छल आ इम्हर आनंद एहि सब सँ अंजान अपन धुन मे कखनो बड़बड़ाइत , कखनो हाथ चमकाबैत गामक पूब गाछी दिश कए बाट धेने जा रहल छल । गाछी मे एकटा झमटगर आमक गाछ त'र बैस रहल ,गाछ सँ खसल टिकुला बिछ क' जमा केलक आ एक-एक टिकुला उठा सामने पड़ल पत्थर पर मारैए जखन सब टिकुला खतम भ' जाए त' फेर सँ बीछ पहिले जकाँ पत्थर पर मार' लागैए । कतेको घंटा एनाहिते करैत रहल । समय आ सुरूज उपर चढ़ैत गेलन्हि आ आब सुरूज देब सीधे माँथ पर आबि गेलन्हि । रौद सीधे आनंदक देह पर पड़लै , जखन गरम लागलै त' ओत' सँ उठि क' गाछक जैड़ मे सटि क' बैस रहल , टिकुला फेकनाइ बंद क' सामने देखलक ,सब किछ बदलल-बदलल बूझहेलै , नै पहिलुका रंग आ नै पहिलुका आनंदक लहर भेटल |

तीन वर्ष पहिले एत' भीड़ लागल रहै छलै गामक युवा वर्गक पहिल पसंद छलै इ मैदान जे आब खेत बनि गेल छलै , गामक नेना-भुटका सँ नम्हर धरि गेंद-बल्ला- बिकेट ल' भोरे सँ मस्त भेल एत' खेलै छलै ।एहि ठामक मजा ल'ग टि.भी वला आइ .पि .एल एको क्षण नै टीक सकै छलैए , मुदा मैदानक मालिक कए इ खेल नीक नहि लागै छलै तेँए एक दिन राता-राती सौँसे मैदान जोति देलक आ राहरि बाउग क' देलक । तहिये सँ खेलक इ आशियाना उजरि गेलै । आनंद कए एहि मैदान मे पाकल गहुमक बालि देखेलै जे हवा सँ टकरा कोनो कमसीन नाच' वाली के पातर डाँर कए लचक जकाँ बेली डाँन्स करैत छलैए । सुरूजक किरण ओहि पाकल बालि कए और स्वर्ण रंग द' रहल छल ।पूरा खेत रावणक सोना कए लंका जकाँ रौद मे चमकि रहल छल , दुपहर कए गर्मी मे चलैत लू सँ काँपैत हवा मे फराक-फराक आकृती सब बनबै छलै कखनो डेराउन त' कखनो मनोरम , एहि दृश्य मे डूबल कखन आँखि लागि गेलै जानि नहि । आँखि लागैत देर नहि आनंद एहि दुनियाँ कए छोड़ि श्वप्न नगर मे चल गेल । ओहि अद्भुत श्वप्न परी कए देश मे यादि आब' लागलै आइ सँ तीन साल पहिलुक ओ दिन . . . ।

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काँलेजक पहिल दिन , गामक उच्च विद्यालय सँ पास भ' लाखो छात्र-छात्रा नव सपना संग पैघ-पैघ शहर कए नामी काँलेज सब मे नामाँकन करेलक आ तकर बाद 10-10 टा किताब क झोरा छोड़ि दू टा काँपि ल' काँलेजक गेट पर स्वतंत्र मोन सँ छात्र-छात्रा सब कए लागै जे स्वतंत्रताक लड़ाइ जीत लेलक ,गजब कए मुस्कान सबहक अधर पर नाचि रहल छल । स्कुलक टाँप आनंदो अपन काँलेज पहुँचल मुदा काँलेज कए गेट पार करै कए साथ ओहि ठामक काज देख अधरक मुस्कान बीला गेलै । छ'-सात टा लड़का-लड़की एकरा घेर लेलक आ सबाल-जबाब कर' लागल कखनो एकर त' कखनो हेयर स्टाइलक , कखनो पहिराबा कए त' कखनो गाम-खानदान कए मजाक कर' लागल । आनंद कए तामस तरबा सँ मगज धरि पहुँचि गेलै मुदा नव अछि कैये की सकै यै ?

तखने एकटा लड़का एगो गुलाबक फूल दैत कहलक ,"रै , सामने ललकी ओढ़नी मे पिछु घुमल जे लड़की ठाढ़ छौ ओकरा हमरा दिश सँ आइ लव यू कहि क' इ गुलाब देने आ ।"

आनंदक मोन नहि मानै छलै तेँए ओ हिलबे नै केलै ,जखन सब देखलक जे इ नहि जा रहल अछि त' एक चमेटा मारैत घेकलि देलक जै सँ आनंद खसैत-खसैत बचल , ओ समझि गेल जे जँ एकर बात नहि मानब त' मारत तेँए मोन मसोसि क' गुलाब उठा ओहि लड़की लग चल गेल । ओकर पिछ आनंद दिश छलै तेँए ओकर मुँह देखाइ नै पड़लै खैर आनंद कहलक ,"मैडम ,"

इ सुनि लड़की पलटल , आनंद के ओकर मुँह चिन्हार लागलै , लाल लिपिस्टीक सँ रांगल ठोर आँखिल काजर , केशक स्टाइल आ एकर चिर-परिचित परफ्युमक खुशबू , सब किछ चिन्हार सन लागलै मुदा मोन नहि पड़ि रहल छल जे ओ के छथि?

आनंद अपन बात आगु बढ़ेलक ,"मैडम , हम जे किछ कहब सँ हमरा सँ ओ छौड़ा सब कहबा रहल अछि तेँए हमरा माँफ करब ओ हरीयरका टिशर्ट वला अहाँ कए आइ लव यू कहलक यै आ इ गुलाब देलक यै ।"

गुलाब दै काल ओहि चिन्हार मुदा अनचिन्हार सन लड़की कए हाथक स्पर्श मात्र सँ अंग-अंग एना सिहरि गेलै मानु जे 440 वोल्ट कए झटका लागल हो ।
ओ लड़की गुलाब ल' बाजल ," कोनो बात नै हम खराप नहि मानलौँ ,ओ अबारा छौड़ा-छौड़ी हब हमरो रैगीँग लेलक आ अहूँ कए ल' रहल अछि , ओना अहाँ . . . "
ओ लड़की अपन बात खतमो नहि केने छलै की प्रिंसपल साहेब ओहि ठाम आबि गेलन्हि , प्रिँसपल साहेब कए देख रैगीँग लेनिहार सब छौड़ा-छौड़ी पड़ा गेल । आनंद आ ओ लड़की दूनू प्रिंसपल साहेब कए गोर लागलक आ हुनके संगे क्लास दिश चलि देलक । गामक स्कुल मे लड़का-लड़की अलग-अलग बेँच पर बैसै छलै मुदा एहि ठाम एहन भेद-भाव नहि छलै , जेकरा जत' मोन होइ ओ ओत' जा क' बैसल । आनंद आ ओ लड़की संग एके बेँच पर बैसल , ऐ दिनक बात संयोगे सँ वा जानि-बूझि क' तीन दिन धरि संग उठला बैसला कए बादो कोनो तरहक बात-चित नै भेलै । चारिम दिन पहचान -पत्र पर मोहर लगाबै लेल जखन दूनू समान्य कक्ष गेल त' ओहि लड़की कए नाम-गाम पढ़लक तकरा बाद ओ अनचिन्हार लड़की पूर्णत: चिन्हार भ' गेल तेँए आनंद बाजल ," सीमा , हमर नाम आनंद अछि आ अहीक गाम के छी । दूनू गोटे सतमाँ धरि एकै स्कुल मे पढ़लियै आ तकरा बाद अहाँ बजार आबि गेलौँ आ हम गामे मे रहि गेलौँ , यादि ऐल की नै ?"

सीमा जखन अपना बारे मे एतेक बात सुनलक त' उहो बाजल ,"हाँ आनंद ,सब किछ यादि अछि ।हमरा पहिले दिन सँ होइ छलैए जे अहाँ कए कतौ देखने छी मुदा लाजे किछ नहि बाजै छलौँ" "

आनंद मोने-मोने बड खूश छल कारण एहि अंजान शहर मे केउ त' चिन्हार अछि ।मोहर मरबा दूनू बगीचा मे जा क' बैसल आ पुरना बात कए मोन पाड़' लागल , पाकरि त'र गर्दा आ कंकर भरल भाटि मे बोरा पर बैस क' पढ़ाइ , बूढ़बा इमली गाछक मीठगर इमली . भूट्टू मास्टर साहेब , अपन बचपन मे एतेक हेरा गेल जे कखन साँझ भ' गेलै पता नहि चलल । जखन गाछ पर चिड़ाँइ अनघोल कर' लागल तखन दूनू बचपन सँ निकलल ।

एहिना समय बीतैत गेलै । एहि व्यस्त शहर कए व्यस्त जीवन मे एक पटरी पर दौड़ैत दूनू कए दोस्ती एक्सप्रेस कखन प्रेमक स्टेशन पर आबि गेलै , दूनू मे सँ ककरो पता नहि चलल । नव उमरि मे प्रेम भेटला कए बाद एकटा अलगे उर्जा कए संचार अंग-अंग मे होब' लागलै , दूनू कए नजरीया सत प्रतीशत बदलि गेलै , काल्हि धरि किताब-काँपि ,पढ़ाइ-लिखाइ कए बारे मे सोचै वला आइ अपन भविष्यक बारे मे सेच' लागलै , अपन-अपन कैरियर कए लेल सोचबाक लेल नव-नव सपना कए महल बनब' लागलै , राति दिन भोर-साँझ एक-दोसरक नैनक झील मे डूबि जीबनक सब सँ पैघ आनंदक अनुभूति कर' लागलै । बाट चलैत जग सँ अंजान भ' इएह पाँति गुनगुनाब' लागलै

भेटल अहाँ के संग हमरा जहियेसँ
जिनगी हमर लेलक करोटो तहियेसँ

हम एकरा की कहब छल एहन भाग
बैसल छलौँ हम बाट मे दुपहरियेसँ

गेलौँ शिखर पर भेल जे एगो स्पर्श
जुड़ि गेल साँस प्राण संगे कहियेसँ

छी ग्यान{GYAN} के पेटी अहाँ जादू गजल
शाइरक कोनो कलम लागै हँसियेसँ

हम भेल नतमस्तक लिखब कोना शब्द
शाइर "अमित" छी संग हमरा जहियेसँ

कहल गेलै यै जे जँ सच्चाइ कए संदुक मे बंद क' सात ताला मारि सागर मे भसा देल जाए तैयो एक-ने-एक दिन ओ ताला तोड़ि समाजक सामने जरूर आबै छै , आ जँ ओ सच्चाइ लड़का-लड़की कए प्रेमक होइ त' ओ जंगल कए आगि-जकाँ क्षण मे सगरो पसरि जाइ छै । इ समाज एहन सच्चाइ पर हास्य-व्यंग आ चुटकी लेब' लागै छै । आनंद-सीमा कए प्रेमक खिस्सा काँलेजक बाउण्ड्री तोड़ि सीमा कए बाबू जी डाँ. देबेन्द्र धरि पहूँचि गेल ।ओ आनंद कए डराब'-धमकाब' लागलन्हि मुदा आनंद आधुनिक लोक रहितो आधुनिक नहि छल , आइ -काल्हि कए लोक प्रेम-प्रेम नहि वासना बूझैत छथि , हुनका लेल आ आधुनिक प्रेमक अंत मात्र शारीरीक मिलन होइत धेन आ तकरा बाद ओ प्रेम गटर कए कीड़ा जकाँ अशुद्ध भ' जाइ छै ।
मुदा आनंदक मोन मे ऐ तरहक कोनो बात नहि छलै , ओ अपन प्रेम कए सम्मान द' वियाह धरि पहुँचाब' चाहै छलैए तेँए कोनो तरहक धमकी एकरा पर असर नहि क' सकलै , संगे सीमा सेहो डाँ . देबेन्द्र पर अपन प्रेम सफल करबाक लेल दबाब देब' लागलै । तीनू अपन-अपन बात पर अड़ि गेल । इएह घिचम-तीड़ा कए बीच दूनू इंटर कए पढ़ाइ खतम केलक । समय बढ़ैत गेल संगे प्रेमक गाछ फूलाइत रहल आ डाँ . देबेन्द्र पैघ-पैघ ढेला फेक एहि फूलाइल गाछ कए फूल तोड़ैत रहलन्हि , अंतत: एक दिन डाँ. साहेब आनंद कए अपन डेरा बजौलनि ।

आनंद गुनधुन मे पड़ल जखन सीमा कए डेरा पहुँचल त' डाँ . देबेन्द्र कहलनि ,"देखू अहाँ दूनू कए प्रेमक आगू हम हारि गेलौँ , हम एहि वियाहक लेल तैयार छी मुदा वियाह कोनो बच्चा कए खेल नहि छै , वियाहक पश्चात बहुतो रास जीम्मेदारी माँथ पर आबि जाइ छै । बियाहक बाद सीमा कए कत' राखब ? "

आनंद बाजल ," हमहू जानै छी जे वियाह कोनो खेल नहि छै आ जहाँ धरि वियाहक बाद रहै कए सबाल छै त' गाम मे अपन-घर अछि । अहाँ जानिते छी अपन जमीनो अछि त' ओत' हमरा दूनू गोटा कए जीवन बढ़ियाँ जकाँ कटि जाएत ।"

"मुदा हमर बेटी गाम मे नहि रहि सकै यै किएक त' ओ बजार मे सब सुबिधा सम्पन्न घर मे रहि रहल अछि । हमरहमर बेटी गामक भनसा घर मे घुआँ नै पियत ।"

"आब गामो मे विकास भ' रहल छै हमरो गाम मे गैस .सड़क , रेल आ बिजली कए सुविधा अछि तेँए कोनो तरहक दिक्कत नहि हेतै । तैयो जँ सीमा कए इच्छा बजार मे रहबाक हेतै त' गामक कोनो जमीन बेचि बजार मे घर बना लेब । " आनंद सँ लबालब भरल बाजल ।

देबेन्द्र बाबू चाह आ बिस्कुट कए ट्रे आनंद दिश बढ़ाबैत बाजलन्हि ." से सब त' ठीक छै मुदा एतेक जल्दी इ सब नहि भ' सकै यै ।" दु -तीन चुस्की चाह सँ घेँट भिजेला कए बाद बात आगू बढ़ेलन्हि ," एखन अहाँ दूनू कए उमरि कम अछि आ ऐ उमरि मे कानून वियाहक आदेश नहि दै छै .दोसर विआहक बाद घरक खर्चा बैढ़ जाइ छै ।एखन अहाँ अपन माए पर निर्भर छी आ माए खेती-बाड़ी पर , आ सब जानै यै जे खेती सँ एतेक कमाइ नहि होइ छै जै सँ आधुनिक साज-समान कए साथ बजार मे जीवन ऐश-मोज सँ कटि सकै । जा धरि अहाँ अपन पएर पर नहि ठाढ़ हेएब ता धरि केऊ बेटी वला अपन बेटी कए हाथ अहाँ कए हाथ मे कोना द' देत आखिर सब माए-बाप कए किछ स'ख-मनोरथ होइ छै की नै?"

चाहक कप राखैत आनंद कने चिन्तीत मुद्रा मे बाजल ," अहाँक बात सत्य अछि हमहुँ इ नहि कहै छी जे एखने हमर वियाह क' दिअ , जहाँ घरि अपन पएर पर खड़ा होइ कए बात छै त' हमर इंटर भैये गेल ।हमर नानी गामक किछ लोक दिल्ली मे रहै छथि त' हम सोचै छी जे ओतै जा किछ दिन काज करब , तखन धरि उमरि भ' जाएत तकर बाद हमर वियाह क' देब ।"

डाँ0 साहेब अधर पर कुटिल मुस्कान फैलाबैत बाजलन्हि ." अहाँक इ बात हमरा नीक लागल ।अहाँ अपन पएर पर ठाढ़ भ' जाउ हम अश्वासन दै छी अहाँ प्रेम सफल करबा देब ।"

एहि भेँट कए बाद आनंद के सीमा सँ वियाह करबाक सपना सच लाग' लागलै । ओ अपन प्रेमक सफलाता कए लेल कठीन सँ कठीन काज करबाक लेल तैयार छल । अपन पढ़ाइ बीच मे छोड़ि दिल्ली जाएबाक मोन बना लेलक । कनियाँ काकी कए सब बात बता तीन दिन कए बाद दिल्ली कए गाड़ी पकरि दिल्ल चलि गेल । अपन प्यार , अपन गाम . अपन सीमा सँ हजारो किलोमीटर दूर दिल्ली कए भीड़-भाड़ वला गली , बड़का-बड़का सोसाइटी मे हेराएल-भुतलाएल काज खोज' लागल । बड दौड़ धूप कए बाद रिश्ता कए मामा अपन सेठ सँ बात क' 12 घंटा कए नोकरी आ पाँच हजार दरमाहा पर काज धरा देलकै । भोर सँ साँझ धरि हड्डी तोड़ला कए बादो एते कमाइ नहि होइ छलै जाहि सँ कहि सकैए जे आब परिबारक भार उठा सकै छी । सब राति सीमा कए फोटो करेजा सँ साटि कसम खाए जे काल्हि आइ सँ बेसी मेहनत करब । उम्हर आनंद सीमाक प्रेम मे अपन देह गला रहल छल आ इम्हर सीमा अपन पढ़ाइ आगु बढ़ा रह छलै । समय तीब्र गती सँ बढ़ैत गेलै , आनंदो कए परमोसन होइत गेलै , आब 15000 टका कमाइ बला सुपरबाइजर भ' गेल । आफ ओकरा लाग' लागरै जे ओ अपन आ सीमा कए बजार मे रहै कए खर्च कमा लै यै त' ट्रेन ध' गाम आबि गेल । गाम आबिते देर नहि , सब सँ अपन दोस्त सब सँ सीमा कए बारे मे पुछलक त' पता लागलै जे देबेन्द्र बाबू ओकर वियाह अपने हाँस्पिटलक डाँ0 सँ ठीक क' देने छथिन ।सीमा कए मोन बदलि गेल छै आ दू दिन बाद गामे मे वियाह छै । इ शुभ सन अशुभ समाचर सूनै कए साथ आनंद बौक भ' गेल , किछ फुरेबे नै करै , जकरा लेल पढ़ाइ छोड़लक , 12-12 घंटा देह गलेल , से ओकरा छोड़ि दोसर सँ वियाह क' रहल छै ।
आनंद कए विश्वास नहि भेलै तेँए ओ सीमा कए घर सँ बहराए कए बाट जोह' लागल । सँयोग सँ ओहि साँझ गामक बजार मे भेँट भ' गेलै , सीमा कए संगे केउ नहि छलै तेँए बीना कोनो झंझट कए आनंद सीधे सीमा लग गेर । सीमो आनंद कए देख रूकि गेलै ।
आनंद सीमा लग जा बाजल ." सीमा , अहाँक बाबू जे किछ चाहैत छलथि ओ सब हम पूरा क' देलौँ । आइ हम 15000 टका कमा लै छी आ कानून कए मुताबीक उमरि भ' गेल तेँए अपन वियाह मेँ आब कोनो रूकाबट नहि अछि । अहाँक बाबू जी हमरा अश्वासन देने छलथि मुदा हम सूनि रहल छी जे अहाँक वियाह काल्हि कोनो डाँक्टर सँ भ' रहल अछि । अहाँ हमरा सँ प्रेम केरै छलौँ तखन आ सब की भ' रहल छै ? अहाँ एकबेर अपना मुँह सँ कहि दिअ जे अहाँ मात्र हमरे सँ प्रेम करै छी आ इ वियाहक बात झूठ अछि ।"

आनंदक बात सूनि ओ मृग समान कारी नैन लाल भ' गेलै ,मुँह पर कठोरता कए भाव नाच' लागलै , ओ मीठ बाजै बला जवान सँ आगिक धधरा जकाँ शब्द बहरेलै
," इ सबटा बात एकदम सत्य छै ,जहिया अहाँ सँ प्रेम केलौँ तहिया हम बच्चा छलौँ मुदा बाबू जी हमर आँखि खोलि देलनि । हमर बराबरी क' सकी एतेक अहाँ क ओकाइध नहि अछि । अहाँ मात्र इंटर पास छी आ हमर M.B.B.S कए फाइनल इयर छै । एकटा 15 हजार कमाइ वला कए हाथ मे अपन हाथ द' हम अपन जीवन किएक बर्बाद करब ? जतेक अहाँ एक महिना मे कमाइ छी ओतेक हम एक दिन मे खर्च करै छीयै । जीवनक ग्राफ पर अहाँ बाँटम मे छी आ हम टाँप पर , बाँटम आ टाँप सदिखन पैरलल रहै छै रहै छै आ अहाँ त' जानिते छी जे पैरलल लाइन कखनो मिलै नहि छै तेँए अपन दूनूक मिलन संभबे नहि अछि ।अहाँ अपध दिल आ दिमाग सँ हमर नाम मेटा लिअ । अहाँ हमर संगी छी तेँए वियाह मे आएबाक निमंत्रण द' रहल छी ,मोन हेएत त' आबि क' देख लेब हमर होइ वला ब'र कए । हमरा बहुत काज अछि ,हम जा रहल छी ।अहूँ हमरा बिसरि क' घर जाउ|"

इ कहि सीमा कार मे बसि गर्दा उड़ाबैत ओहि ठाम सँ चलि गेल । आनंद ओहि गर्दा सँ नहा गेल । दुनियाँ नाच' लागलै ,चक्कर आब' लागलै आ आनंद बीच्चे सड़क पर खसि पड़ल ।
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इ सब सपना बनि गाछ तर सूतल आनंदक आँखि मे नाचि रहल छल तखने गाछ सँ एकटा टिकुला टूटि आनंदक मुँह पर खसलै । टिकुला के चोट लागैते नीन खुजि गेलै । उपर चंदा मामा चमकि रहल छरखिन ,तारा टिमटिमा रहल छर , चारू कात अन्हार पसरि गेल छलै । गाम दिश देखलक त' गामक छोर पर नव कनियाँ सन सजल घर साफ-साफ देखाइ देलकै । लाल-पियर-हरीयर बाँल भूक-भूक क' रहल छलै ।डि.जे वला बैण्ड पर बाजैत नवका धुन बाताबरण मे अनघोल क' रहल छलै ।आनंदक मोन मेँ गजबे तूफान उठ' लागलै ।सोचै , जकरा लेल एतेक मेहनक केलौँ सएह नै भेटल । की हमर गलती इ अछि जे हम गरीब छी? जाति त' एकै छै तखन की हमर गलती इ अछि जे हम एक समाज आ एक गामकए छी वा इ जे हम कहियो प्रेम केलौँ ?
बहुतो रास सबाल मन मे उठै छल आ बहुतो सबाल आँखि सँ बहैत नोर क' रहल छल ।
तखने अकाश मे बिजुरी जेना चमकि उठलै , उपर लाल-पियर - हरीयर आगिक चिनगी चमक' लागलै ,ब्राम-ब्रूम क' फटक्का फूट' लागलै । आनंदक आँखि सँ नोरक धार गाछक जरि के पटा रहल छल । ब्राम ब्रूम फटक्का फूटि रहल छल आ आइ फेर एकटा प्रेमक अंत भ' रहल छल ।


समाप्त

केहन लागल से जरूर कहब
साभार विदेह इ -मैथिली पाक्षिक पत्रिका

अमित मिश्र

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

प्रेम नै, जहर छै

बड हिम्मत क एकटा खिस्सा लिखवाक कोशिश केलौं | हम्मर मैथिली मे पहिल कहानी अछि . विषय कोनो नव नै अछि मुदा हम अपना तरीका सँ लिखबाक भरिसक कोशिश केने छी | आशा करै छी जे अहांके नीक लागत |
*** प्रेम नै जहर छै ***
एकटा गाम | मननपुर | भोरक समय | गामक बीच दुर्गा मंदिर सँ उठैत नारी स्वर , गीतक एहन प्रवाह लगे छल जे स्वयं सरस्वती कमलक आसन पर बैस अपन हाथक वीणा संग मधुर भजन गाबि रहल छथिन | यैह भजन " जय जय भैरबी .........." सँ ऐ गामक मनुष्य आ अपन अंखि खोलै छथि | आब फरिच्छ भs गेल छै | किसान अपन बरदक संग खेत दिश चललाह |बरदक घेट मे बान्हल घंटी , ओही मधु भरल स्वर संग ताल -में ताल मिलायवाक भरिसक कोशिश क रहल छै | भोर सात बजे एहि गाम सँ ओही नारी के पहिल भेंट होई छै | किरण , जी हाँ ,किरण नाम छै ओकर | सोलह -सत्रह वर्ष के घेट लगेने , मानु कोनो आधा खिलल गुलाबक कली | यौवनक चिन्ह आब उजागर होबs लागल छै | सुन्दरताक चलैत-फिरैत दोकान ।ककरो सँ कोनो उपमा नै अनुपम ।एकदम मासुम मुँह ,समाजक रीति-रिवाज सँ अंजान ।गाम मे सबहक चहेती ।कोनो काज एहन नै जे ओ नै क' सकैए ।सब काज मे पारंगत ,किरण ।
" किरण ,गै किरण ,कतS चल गेलही ,स्कुलक देर भ' रहल छौ ", सुलोचना टिफिन बन्न करैत किरण कए सोर केलखिन ।
" आबै छियौ ,बस दू मिनट ", कहैत किरण घर सँ बहरायल ।कनेक काल ठमकि ठोर पर मुस्की नचबैत बाजल ," माँ आइ कने देर सँ एबौ ,आइ ने हमर सहेली पिंकी कए जनमदिन छै ," आ इ कहैत साइकिल ल' स्कूल दिश चल देलक ।
स्कूल मे एकटा लड़का छलैए ,राकेश, पढ़ै-लिखै मे गोबरक चोत ,मुदा पाइबाला बापक एकलौता बेटा ,से पाइ कए गरमी जरूर छलैए ।सब साल मास्टर कए दु टा हजरीया द' दै आ वर्ग मे प्रथम क' जाए ।एक नम्मर कए उचक्का ।ओ जखन-तखन किरण कए देखैत रहैए ।आब किरण गरीब घरक सुधरल बेटी ,ओ की जानS गेलै ,जे कनखी कए अर्थ की होइ छै ।जहिना आन सब छात्र-छात्रा राकेशक किनल चाँकलेट ,मलाइबर्फ ,बिस्कुट आदि अनेको चिज सब खाइ छल ओहिना किरणो बिना छल-प्रपंच कए राकेशक संग रहै छल ।इम्हर किछ दिन सँ राकेश मंहगा सँ मंहगा आ सुन्नर सँ सुन्नर चिज-बित सब आनि क' किरण कए चुप्पे-चाप दै छलै ।जै अवस्था मे एखन किरण छल ओहि मे विपरीत लिंगक प्रति आकर्षण भेनाइ स्वभाविक छै ,आ जौँ पैसा कए गमक लागि जाए त' फेर बाते कोन छै । इएह कारण छै जे राकेशक संग आब नीक लागS लागलै । राकेशक जादु एहन चलले जै मे फँसि पढ़ाइ-लिखाइ सब पाछु छुटि गेलै आ मस्ती हावी भ' गेलै । ऐ आकर्षण कए नाम देलक "प्रेम" । प्रेम ,जाहि शब्दक एखन धरि कोनो उपयुक्त परिभाषा नै भेटल । प्रेम ,जकरा बेरे मे जतेक लिखब ततेक कम ।प्रेम ,शायरक तुकबंदी ,दिल कए मिलन ।प्रेम , जे मौत सँ लड़बाक साहस दै छै । लैला-मजनु बाला प्रेम भेल छलै अकी किछु और जानी नै ।
" आउ ,आउ , आइ बड़ देर क' देलियै ," किरण कए आबैत देख राकेश बाजल ।
" हाँ ,की करब साइकिल पंगचर भ' गेल छल " किरण जबाब देलक ।
राकेश मक्खन लगाबैत बाजल ," आहा , हम्मर जान कए आइ बुलैत आबS पड़लै . . . काल्हि चलब नवका स्कुटी किन देब . . . तखन नै ने कोनो दिक्कत ।"
किरण मुस्कुराइत बाजल ," दुर जाउ ,स्कुटी पर चढ़बै त' गामक लोग की कहतै । कहतै जे छौड़ी बहैस गेलै ।"
" लोग किछु कहैए कहS दियौ ,अहाँ बताबू वेलेंटाइन डे अबि गेल छै गीफ्ट की लेबै ," राकेश एक्के साँस मे बाजल । " हम किछु नै लेब ,जखन प्रेम केलौ आ बियाह करबे करब तखन अहाँक सब किछ अपने आप हम्मर भ' जेतै ," किरण विश्वास के साथ बाजल ।
कनेक काल मौन ब्रत कए पालन केला कए बाद राकेश किरणक हाथ पकरैत बाजल ," किरण ,हम चाहै छी ऐ बेर वेलेंटाइन डे पर दरभंगा घुमै लेल चलब । जौं अहाँ कहब त' एखने होटल बुक करबा दै छी " फेर कने और लग आबि बाजनाइ शुरू केलक ." ओतS खुब मस्ती करब ,फिलम देखब आ राज मैदान मे पिकनिक मनायब आओर बहुतो रास गप्प करब ।"
किरण अपन हाथ छोड़बैत बाजल ," नै नै हम असगर अहाँ संग दरभंगा नै जायब । माँ हम्मर टाँग तोड़ि देत , अहाँ जायब त' जाउ हम एतै ठिक छी ।"
" हे . . .हे . . . हे . . . हे . . . एना जुनी बाजु " राकेश किरण कए पँजियाबैत बाजल ," हम अहाँ होइ बाला घरबाला छी आ पति संग घुमै मे कोन हर्ज छै , मात्र एक्के दिन कए त' बात छै , अहाँ कोनो बहाना बना लेब ।"
जेना-तेना क' राकेश अप्पन बात मना लेलक ।तय दिन किरण आ राकेश शिवाजीनगर सँ बस पकैड़ दरभंगा दिश चल देलक । भरि रस्ता प्यार-मोहब्बत कए बात बतियाइत रहल । दरभंगा आबि राज किला देखलक ,श्यामा मंदिर ,मनोकामना मंदिर मे पुजा केलक , टावर चौक सँ शाँपिँग केला कए बाद साँझ होटल मे आयल ।
आब एक कमरा ,एक बेड ,दु जन ।बड़ मुश्किल घड़ी छलै । राकेश कहलक ."आउ कने सुस्ता लै छी ,काल्हि भोरे एहि ठाम सँ विदा हएब ।" किरण प्यार कए कारी पट्टी सँ अपन आँखि बान्हि लेने छलै ।बिना किछु बाजने ओ सब करैत गेल जे राकेश चाहै छलै ।जौं कखनो बिरोधो करै त' प्रेमक दुहाई द' राकेश मना लै छलैए ।और अन्ततः ओ भेलै जे नै हेबाक चाही ।प्रेमक मायाजाल मे फसल प्रेमक मंत्र सँ वशिभुत कएल किरण किछु नै बाजल .शायद अप्पन प्रेम पर हद सँ बेसी विश्वास छलै । भोरे नीन खुजलै त' अपना आप कए असगर देखलक । कनेक काल प्रतिक्षा केलक मुदा राकेशक कोनो अता-पता नै छलै । काउन्टर पर सँ पता चललै जे राकेश त' तीन बजे भोरे चल गेल छलै ।
आब बुझु किरण पर बिपत्ती कए पहाड़ टुटि पड़लै । बिभिन्न तरहक बात मोन मे आबै ।माँ कए की कहब .आगु जीवन कोना काटब ,लोग की कहतै ।सोचैत-सोचैत मोन घोर भ' गेलै । गाम दिश जायबाक लेल डेगे नै उठै । कतS जायब ,की करब । चलैत-फिरैत लहाश भ' गेल छलै किरण । भीड़-भाड़ मे रहितो एकदम तन्हा ।मनक तुफान रूकबे नै करै । बेकार , जीवन बेकार भ' गेलै ।सबटा सोचल सपना क्षण मे टुटि गेलै । सोचै ,माँ कए अफसर बनि क' के देखेते , भगबती कए गीत के गेतै ।
एतेक दिन दुर्गा माँ कए पुजा केलौ... तकर इनाम इ भेटल ।....सब झुठ छै ,... देवी-देवता सब बकबास छै ..... गरीबक साथ कोनो देवी-देवता नै दै छै ।...... सब कहै छै ,. प्रेम बड़ नीक शब्द छै ,..........प्रेम सँ पत्थर दिल मोम भ' जाइ छै ,.....मुदा नै....... ,प्रेम त' जहर छै ,जहर ... जै सँ केवल मौत भेटै छै ,मौत कए सिवा किछु और नै ,मौत . . . मृत्यु . . . .मौत . . .जहर . . . । हम जानि-बुझी क' इ जहर पिलौँ ।........ हम अपवित्र छी , हम कुलक्षणी छी ......., हम धरती परक बोझ छी ......हमरा जीबाक कोनो अधिकार नै । हमरा सन के लेल ऐ दुनिया मे कोनो जगह नै । ............हम माँ-बाप कए इज्जत और निलाम नै करब ।......हम मरि जायब , ककरो किछु खबर नै हेतै । ......हम अप्पन बलिदान करब ।अनेको रास बात सँ माँथ लागै फाटि जेतै । ओ एक दिश दौड़ल ,किम्हर .से ओकरो नै पता , ओ कतS जा रहल छै ....., नै जानी । ....दोड़ैत-दौड़ैत भीड़ मे कत्तो चल गेलै । अप्पन अन्जान मंजील दिश ।
भोरे आखबारक मुख्य पृष्ट पर मोट-मोट अक्षर मे लिखल छल " सोलह-सतरह साल कए एकटा गोर-नार युवती रेलवे पटरी पर दू टुकड़ी मे भेटल ।नाम-गाम कए पता नै चलल अछि । पोस्टमार्टम कए लेल लाश भेज देल गेलै यै । अंतिम दाह-संस्कार पुलिसक निगरानी मे होयत . . . । ।
{ समाप्त } ऐ कहानी कए घटना .पात्र .नाउ सब काल्पनीक अछि । कोनो सत्य घटना सँ प्रेरीत नै छी ।हम्मर उद्येश्य किनको ठेस पँहुचयबाक नै छल । हम ओ सब नवयुवक-नवयुवती ,जे प्रेमक सागर मे डुबकी लगेने छथि वा लगाबS चाहै छि , सँ कहS चाहब जे प्रेम खराब नै छै ,लेकिन प्रेम सोचि-समैझ कए करबाक चाही । बिना सब किछ जानने एकांत मे नै जायबाक चाही । पाठकगण , जौ कत्तौ कोनो गलती बुझाए त' हमरा कहब हम सुधारबाक कोशिश करबै । ऐ मे कत्तौ-कत्तौ आन भाषाक शब्दक प्रयोग भेल हेतै आ टाइपिंग मे गलती भ' सकै छै । तै लेल क्षमा चाहब । केहन लागल से जरूर बतायब । अहाँक
अमित मिश्र