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शनिवार, 28 अप्रैल 2018

गजल

गजल

अहींकेँ लेल हे प्रियतम हिया अजबारि रखने छी
अहाँकेँ देल सब टा यादिकेँ सम्हारि रखने छी

चलू चलि जाइ दुनियाँ छोड़ि हम निर्जन सघन वनमे
रहब हम आ अहाँ केवल कथा विचारि रखने छी

कथी छै मोल ई देहक कतहुँ नै देहकेँ मोजर
अनेरे रूपकेँ प्रियतम सजा संवारि रखने छी

उठै छै मोनमे पीड़ा जखन दै मीत सब धोखा
हँसय नै लोक दोस्तीपर, मनहिमे गाड़ि रखने छी

कहाँ छै जोर ई मनपर पथिक ई मस्त मौला छै
भटकि नै जाइ बाटसँ 'अमित' तेँ पुचकारि रखने छी

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अमित मिश्र

गजल

गजल

रावणक मुत्ती सँ लुत्ती नै मिझा सकैए
कंठ जेना ओस चाटिक' नै भिजा सकैए

आंत जुन्ना जखन बनि गेलै भुखे पियासे
छोट सरकारी मदति भुख नै भगा सकैए

गेल गामक गाम जड़ि सुड्डाह भेल कोठी
ठोर मुस्की दैत हाथो नै उठा सकैए

पाइ के छाहरि बिछौना पर जँ सुतल नेता
दर्द लोकक ओकरा कोना जगा सकैए

आब महगाई ल' रहलै आइ जीब कोना
"अमित" कागज नै गजल कोना लिखा सकैए

     2122-2122-212-122
     
         अमित मिश्र

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

गजल

खाली हुनक बाते छलै फूल सन
बाँकी बचल सबटा छलै शूल सन

खंजर बनल नैनक कमल कोर छल
ठोरक त' लाली आगि जड़ मूल सन

बदलल किए सब आइ से  जानि नै
छल नेह काँटक पैघ टा कूल सन

छै आब सपना देखब व्यर्थ सन
भेलै कहाँ ओ हमर अनुकूल सन

जाएब हम पागल भ' कहलौँ सते
छै "अमित" सब किछु भेल निर्मूल सन

2212-2212-212

    अमित मिश्र

शुक्रवार, 26 जनवरी 2018

गजल

गजल-1.34

मूँहपर जाबी बान्हल अछि
गारि मारिसँ जी दागल अछि

नै बजै लुब लुब जँहि तँहि तेँ
छाप कमजोरक छापल अछि

नव तलाकसँ बड सीताकेँ
संग निज रामक छूटल अछि

काज किछु नै नामे बिकतै
ब्राँड सुनि  मेला लागल अछि

एक टा लुत्ती बेसी छै
आगि ईर्ष्या सन धधकल अछि

"अमित" बूझै बड़का काबिल
तेँ समाजसँ ओ बारल अछि

2122-2222
अमित मिश्र

रविवार, 17 दिसंबर 2017

मैथिली गजल

जँ सब अपराध हमर अछि त' सजा अहाँ द' दिअ
गलत की भेल अछि तकर त' पता अहाँ द' दिअ

जँ साबित भेल दोष हम त' गुलाम बनि रहब
कने सत्यपर पड़ल पर्दा उठा अहाँ द' दिअ

चुनौती दैत छी बरी क्षणमे क' देत सब
भले आरोपपर करगर दफा अहाँ द' दिअ

प्रपंचक बलसँ ठार गप चलतै कतेक दिन
मुखौटा सत्य केर अपन बना अहाँ द' दिअ

लगै जे माँछ छी फँसै जे जालमे सदति
फँसा प्रीतक नजरिसँ आब नफा अहाँ द' दिअ

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

मैथिली गजल- जिनगी हमर धोखा दैते ने रहलै

जिनगी हमर धोखा दैते ने रहलै
सब दिन जहर ओ परसैते ने रहलै

कोना हम रहै छी पुछलक ने कहियो
सदिखन नोरमे डुबबैते ने रहलै

लेलौं मानि हम हारल छी तैयो ओ
बनि ओ काल बस पटकैते ने रहलै

जे किछ माँगलौं से देलक ने कहियौ
जे छल हमर से लुटबैते ने रहलै

अंतिम ई निहोरा दिअ एक्के माँफी
बाँकी दिन मनसँ कनबैते ने रहलै

2221-2222-222

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

गजल- एहन सन अपन वेलेंटाइन हेतै

गजल

किछु एहन सन अपन वेलेंटाइन हेतै
प्रेमक अनुबन्धपर दू टा साइन हेतै

किछु माँगब नै अहाँँ, किछु देबो नै करबै
बिनु कहने सब लुटाबै केँ माइन हेतै

हम राखब छोड़ि देने छी काजर सुइया
प्रियतम छै संग, नै कोनो डाइन हेतै

ई दुनियाँ नै हमर छै नै तोहर मीता
हम तोहर छी हमर तूँ, ई माइन हेतै

चल सजतै अपन नेहक आँगन फेरो
जत' जीवनक स्वादो नै अकथाइन हेतै

2222-1222-2222
अमित मिश्र

गुरुवार, 5 मई 2016

गजल- हाड़ मांसक बनल मशीन

जाहि घरमे भूखल दीन अहाँ देखने होयब
हाड़ मांसक बनल मशीन अहाँ देखने होयब
एक पाइक लेल पराण अपन बेच दै छै ओ
गाम घरमे एहन दीन अहाँ देखने होयब
खेतकेँ जे कोड़ि उगा रहलै सोन सन उपजा
ओकरो मन सदति मलीन अहाँ देखने होयब
आँखिमे जनमल सपना अचके तोड़ि दै विधना
डरसँ तेँ हेरायल नीन अहाँ देखने होयब
छूबि दै सोना जँ अमित तँ बनै माँटिकेँ टुकड़ा
खूब एहन भाग्यसँ हीन अहाँ देखने होयब

२१२२-२११२-११२२-१२२२
अमित मिश्र

बुधवार, 4 मई 2016

गजल- ककरो परवाह नै छै

गजल

भगत छै एहि ठाँ डलवाह नै छै
सते ककरो कतौ परवाह नै छै

रहै खेतक हरियरी बिन मवेशी
दुइभ बड छै मुदा चरवाह नै छै

कहै मिथिलाक हम उद्धार करबै
मुदा भाषा अपनपर वाह नै छै

बनै छै खेत उस्सर आब मीता
पलायन कारणसँ हरवाह नै छै

कहै छै सब मुहेंपर गजल सुन्नर
मुदा पुनि पीठ पाछू वाह नै छै

१२२२-१२२२-१२२
अमित मिश्र

शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

हिया अजबारि रखने छी

गजल

अहींकेँ लेल हे प्रियतम हिया अजबारि रखने छी
अहाँकेँ देल सब टा यादिकेँ सम्हारि रखने छी

चलू चलि जाइ दुनियाँ छोड़ि हम निर्जन सघन वनमे
रहब हम आ अहाँ केवल कथा विचारि रखने छी

कथी छै मोल ई देहक कतहुँ नै देहकेँ मोजर
अनेरे रूपकेँ प्रियतम सजा संवारि रखने छी

उठै छै मोनमे पीड़ा जखन दै मीत सब धोखा
हँसय नै लोक दोस्तीपर, मनहिमे गाड़ि रखने छी

कहाँ छै जोर ई मनपर पथिक ई मस्त मौला छै
भटकि नै जाइ बाटसँ 'अमित' तेँ पुचकारि रखने छी

१२२२-१२२२-१२२२-१२२२

अमित मिश्र

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

प्रेममे हमहीं नफा लेलियै

प्रेममे फेर हमहीं नफा लेलियै
अपन जिनगी अहाँ के बना लेलियै
शान्त सरोवरमे जेना कुमुदनी फुलल
मनमे प्रेमक उपवन फुला लेलियै
जेना मीरा रंगल श्यामक रंगमे
एगो राधा लए तहिना रंगा लेलियै
छंदकेँ फंदमे जेना आखर फसल
तहिना दिलकेँ कतौ फँसा लेलियै
फेर भेलै प्रभात बहल पुरबा बसात
देख फोटो प्रियाक गुनगुना लेलियै
🎹🎹🎹🎹🎹🎹🎹🎹🎹
✒✒अमित मिश्र

बुधवार, 21 जनवरी 2015

गजल- बात किछु तऽ खास भेलै


2.51
बात किछु तऽ घरमे खास भेलै
ओहिना तऽ नै उपवास भेलै

मनक बीच दूरी बढ़ल शाइद
पड़ल चुप्प आँगन, मास भेलै

स्वप्न अजगुते सन देखलौं हम
गाम शहर लाशे लाश भेलै

राति खूब भारी बनल ओकर
जकर समयपर नै चास भेलै

छोड़ि काँटकेँ कतऽ जा सकब सखि
ई गुलाब सौमे उनचास भेलै

2121-2221-22

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

गजल- अही कलम अहीँ कागज

गजल-1.51

अहीँ कलम अहीँ कगज हमर गजल छी अहीँ
अहीँ मिजाज हमर भावमे बसल छी अहीँ

धसय धरा खसय गगन कतौ वा अन्हर उठय
हियाक घरक बीच लोह बनि गचल छी अहीँ

 चलय बसात सगर गाममे गमक बोरि तेँ
कहय गुलाब सब परागमे रमल छी अहीँ

उठैत अछि हमर कलम मुदा लिखा नै रहल
सबसँ सुनर सबसँ अलग निशा चढ़ल छी अहीँ

जरैत तेल अछि मुदा जरा कऽ बाती "अमित"
उठय दरद तँ लगय चोट सहि चुकल छी अहीँ

1212-1212-1212-212

रविवार, 16 नवंबर 2014

गजल-किछु नव बात हो

गजल-2.50

हम रही अहाँ रही आर किछु नव बात हो
हम कही अहाँ सुनी आर किछु नब बात हो

जे कहब कहू मुदा तौल लिअ निज बोलकेँ
जे कहब, कहब सही आर किछु नव बात हो

भेद-भाव आइ तजि ठाढ़ एकहिँ मंचपर
प्रीतकेँ बहै नदी आर किछु नव बात हो

सफ हो सभक हिया साफ हो छवि लोककेँ
फड़य गाछ जनु कली आर किछु नव बात हो

बात बातपर हँसय सब हँसय धरती सगर
हो दरद सगर कमी आर किछु नव बात हो

2121-21-2212-2212

शनिवार, 15 नवंबर 2014

किछु लिखा नै रहल

249.

लिखबाक छल जे किछु लिखा नै रहल
पददलित अछि मुँह तेँ बजा नै रहल

अपराध बढ़िते रहत डर नै कतौ
कोनो सजा एखन सजा नै रहल

साधैक खातिर लक्ष्य की सब करब
रस्ता सही की छै, बता नै रहल

सब ठाम भेटल एक सन दुख-दरद के अपन के दोसर पता नै रहल हम मानि गप अहाँ जे कहल
घाटा-नफा हमरा गना नै रहल

2212-2212-212

गुरुवार, 30 अक्टूबर 2014

गजल-दुखरा सुनाबै किए छी

गजल-2.48

सबकेँ अपन दुखरा सुनाबै किए छी
अपनेपर तँ जगकेँ हँसाबै किए छी

छै देबालकेँ कान ई बात जानल
मनमे सदति गप दोहराबै किए छी

चोरल लेल ताला कखन धरि टिकत यौ
कोनो गप हियामे नुकाबै किए छी

देशक हाल जनताक करणीक फल अछि
वोटक बाद नोरो बहाबै किए छी

नै छै मोल कोनो गरीबक जगतमे
बुझितो ई बात मूड़ी उठाबै किए छी

2221-2212-2122

एकटा हिन्दुस्तानमे

गजल-2.47

पवनि-तिहारक सदिखन मेला एकटा हिन्दुस्तानमे
सब धरमक छै रेलमरेला एकटा हिन्दुस्तानमे

एकहिँ ठा पीबय बकरी आ बाध जल, सब मित्रवत रहि
खूब चलै छै नेहक खेला एकटा हिन्दुस्तानमे

एतऽ कतहु नै रोकल जायत घूमि लिअ सगरो देशमे
बनल रहू सदिखन अलबेला एकटा हिन्दुस्तानमे

देश किसानक एखन धरि अछि माँटि सोना उगलै बहुत
हरियर राँगल खेतक ढेला एकटा हिन्दुस्तानमे

ज्ञान बहुत अछि भारतमे लुरिगर बहुत अछि कारिगर सब
पढ़ल-लिखलमे ठेलमठेला एकटा हिन्दुस्तानमे

2112-2222-2212-22212

मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014

अचूक चाल छी अहाँ

गजल-2.46
सबकेँ फँसबैत, जाल नै, महाजाल छी अहाँ
प्रेमक सतरंजपर अचूक सन चाल छी अहाँ

सुर साधै लेल सब कहैत अछि जे रियाज कर
बिनु केने किछु रियाज सधल सुर-ताल छी अहाँ

बीतल छल दुख जते, अहाँक लग दूर होइ छै
सदिखन लागय सजल-धजल नया साल छी अहाँ

नेहक एहन चढ़ल रंग जे उतरि नै रहल
हरियर वा पियर जानि नै कते लाल छी अहाँ

सपनामे बस अबैत छी तड़प दैत जाइ छी
जल्दी चलि जाइ छी समयक कंगाल छी अहाँ

2222-1212-1221-212

शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014

देहक डिबियामे

गजल-2.44
देहक डिबियामे साँसक तेल अजब
अन्तिम गति बुझितो नेहक मेल अजब

सदिखन चिन्ता ई दीया नै मिझाइ
प्रतिपल छै बाती-झंझाकेँ खेल अजब

सब ठाँ झगड़ा उकटा-पैंची सदिखन
उसरल सब काजो भाँगठ भेल अजब

ओ जनमक छल केहन टा ब्याज बचल
ऐ जनमहुँमे नै छोड़ल गेल अजब

जा धरि चलती ता धरि सब संग अपन
जे पोसय से जड़बय ई खेल अजब

2222-2222-121

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2014

गजल-चान दिपली बनि सजै छै

गजल- 2.43

जिम्हरे देखू तिम्हरे जगमग करै छै
उतरि आयल अछि चान दिपली बनि सजै छै

आइ ललसा पुरतै चकोरक छै अमावस
चान अन्हरिया बनि पिया लग जा मिलै छै

सब हँसै छै मुँह झाँपि देखू ओकरापर
जे कतौ लोकसँ अपन दुखड़ा कहै छै

मूर्त केने छी भावकेँ जे छल अमूर्ते
ते सदति रचनाकेँ सगर नीकसँ पढ़ै छै

आइ माहुर सन मोन भेलै देख जगकेँ
पक्षमे नै बेटीक एगो माँ रहै छै

2122-2212-2212-2